रविवार, 19 अप्रैल 2020

*८९. पुरी के पथ में*


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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*ऐसा जनम अमोलिक भाई,*
*जामें आइ मिलै राम राई ॥टेक॥*
*जामें प्राण प्रेम रस पीवै,*
*सदा सुहाग सेज सुख जीवै ॥१॥*
*आत्मा आइ राम सौं राती,*
*अखिल अमर धन पावै थाती ॥२॥*
*प्रकट दर्शन परसन पावै,*
*परम पुरुष मिलि मांहि समावै ॥३॥*
*ऐसा जन्म नहीं नर आवै,*
*सो क्यों दादू रतन गँवावै ॥४॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ३४)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*८९. पुरी के पथ में*
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जब तक उन्‍हें प्रभु के पैरों से उड़ी हुई धूलि और जगदानन्‍द के हाथ प्रभु का दण्‍ड दिखायी देता रहा तब तक तो वे एकटक भाव से देखते रहे, अन्‍त में जब प्रभु अपने साथियों के सहित एकदम अदृश्‍य हो गये, तब खिन्‍न-मन से देखते रहे, अन्‍त में जब प्रभु अपने साथियों के सहित एकदम अदृश्‍य हो गये, तब खिन्‍न-मन से माता को आगे करके भक्‍तों के सहित अद्वैताचार्य अपने घर की ओर लौट आये और श्रीवास आदि भक्‍त उसी समय माता को साथ लेकर नवद्वीप के लिये चले गये।
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इधर महाप्रभु बन्‍धन से छूटे हुए मत गजेन्‍द्र की भाँति द्रुत गति से गंगा जी के किनारे-किनारे चले जा रहे थे। उनके पीछे नित्‍यानन्‍द जी आदि भक्‍त भी प्रभु का अनुसरण कर रहे थे। सब-के-सब गृहत्‍यागी विरागी और अल्‍पवयस्‍क युवक ही थे।
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सभी के हृदय में त्‍याग-वैराग्‍य की अग्नि प्रज्‍वलित हो रही थी। प्रभु ने उन सबके त्‍याग-वैराग्‍य की परीक्षा करने के निमित सभी से पूछा- 'तुम लोग मुझसे सच-सच बताओ, तुमने अपने साथ क्‍या-क्‍या सामान बांधा है और किस-किसने तुम्‍हें मार्ग-व्‍यय के लिये कितना-कितना द्रव्‍य दिया है?'
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प्रभु के ऐसे प्रश्‍न को सुनकर सभी ने दीनभाव से कहा- प्रभो ! हम भला, आपकी आज्ञा के बिना कोई वस्‍तु साथ कैसे ले सकते थे और किसी के द्रव्‍य को आपके बिना पूछे कैसे स्‍वीकार कर सकते थे? आप हमारे सम्‍पूर्ण शरीर को देख लें, हमारे पास कुछ भी नहीं है और न हमसें से किसी ने द्रव्‍य ही साथ में बाँधा।'
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महाप्रभु उनके ऐसे निष्‍कपट, सरल और नि:स्‍पृहतापूर्ण उतर को सुनकर बड़े ही प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- मैं तुम लोगों से अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हूँ। तुमने साथ में द्रव्‍य न बांधकर अपनी नि:स्‍पृहता का परिचय दिया है। नि:स्‍पृहता ही तो त्‍याग का भूषण है।
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जो किसी से धन की इच्‍छा करके संग्रह करता है, वह कभी त्‍यागी हो ही नहीं सकता। त्‍यागी के लिये तो भोजन की चिन्‍ता करनी ही न चाहिये। उसे तो प्रारब्‍ध के उपर छोड़ देना चाहिये। जो प्रारब्‍ध में होगा वह अवश्‍य मिलेगा, फिर चाहे तुम मरुभुमि के घोर बालुकामय प्रदेश में ही जाकर क्‍यों न बैठ जाओ।
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और भाग्‍य में नहीं हैं, तो भोगों के बीच में रहते हुए भी उन्‍हें उन से वंचित रहना पड़ेगा। चाहे जितना धनी क्‍यों न हो, उसके पास कितनी भी भोज्‍य-सामग्री क्‍यों न हो, जिस दिन उसके भाग्‍य में न होगी, उस दिन वह पास में रखी रहने पर भी उन्‍हें नहीं खा सकता। या तो बीमार हो जायगा या किसी पर नाराज होकर खाना छोड़ देगा, अ‍थवा दूसरा आदमी आकर उसे खा जायगा।
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सारांश यह है कि हमें भोग भाग्‍य के ही अनुसार प्राप्‍त हो सकेंगे। फिर किसी से मांगकर संग्रह क्‍यों करना चाहिये। भूख लगने पर घर-घर से मधुकरी कर लो। यही त्‍यागी का परम धर्म हैं।’
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इस प्रकार अपने साथियों को त्‍याग, वैराग्‍य और भक्ति का तत्त्व समझाते हुए सायंकाल के समय आठिसारा नामक ग्राम में पहुँचे और वहाँ परम भाग्‍यवान अनन्‍त पण्डित नामके एक ब्राह्मण के घर ठहरे। प्रभु के दर्शन से वह कृतार्थ हो गया और उसने प्रभु को साथियों सहित भिक्षा आदि कराके उनकी विधिवत सेवा-पूजा की।
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प्रात:काल वहाँ से चलकर खाड़ी नामक ग्राम के समीप छत्रभोग तीर्थ में पहुँचे। यहाँ पर गंगा जी के किनारे एक अम्‍बुलिंग नामक जलमग्‍न शिव है। आज कल तो छत्रभोग और अम्‍बुलिंग शिव जी गंगा जी से दूर पड़ गये हैं, उस समय गंगा जी की शेष सीमा यहीं पर थी। यहीं पर त्रिलोकी पावनी भगवती भागीरथी सहस्‍त्र धाराओं का रुप धारण करके समुद्र में मिलती थी।
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गंगा जी के इस पार छत्रभोग, पीठस्‍थान और सुन्‍दर नगर था। यही गौड़-देश की सीमा समाप्‍त होती थी। गंगा जी के उस पार उड़ीसा-देश की सरहद थी और उसी पर जयपुर-माजिलपुर उड़ीसा के महाराज की अन्तिम सीमा के नगर थे। इन दोनों स्‍थानों में तीन-चार कोस का अन्‍तर था।
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गौड़-देश और उड़ीसा-देश की सीमा को भगवती भागीरथी ही पृथक करती थीं। यह हम पहले ही बता चुके हैं कि वह युद्ध का समय था। जिधर देखो उधर ही युद्ध छिड़ा हुआ है। गौड़देश के बादशाह और उड़ीसा के तत्‍कालीन महाराज प्रताप रुद्र के बीच मे तो लड़ाई-झगड़ा होता रहता था। इसी कारण जगन्‍नाथ जी जाने वाले यात्रियों को गंगा पार होने में बड़ा कष्‍ट होता था।
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गौड़-देश के अधिपति की आज्ञा थी कि उधर से कोई भी पुरुष इधर न आने पावे। उधर उड़ीसा के शासक बंगालियों पर सन्‍देह करते। जो भी पार आता युद्ध के समय सब जगह एक राज्‍य की सीमा से दूसरे राज्‍य की सीमा में जाने पर सभी लोगों को बड़े-बड़े कष्‍ट सहने पड़ते हैं।
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दोनों देशों के शासक सदा शत्रुओं के मनुष्‍यों से शंकित रहते हैं। इसके अतिरिक्‍त पार उतारने वाले बिना उतराई लिये लोगों को पार उतारते ही नहीं थे। बहुत-से पुरी के यात्री उस पार जाने के लिये पड़े हुए थे। प्रभु भी अपने साथियों के सहित वहाँ पहुँच गये। मुकुन्‍ददत अपने सुरीले कण्‍ठ से कृष्‍ण-कीर्तन कर रहे थे।
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प्रभु उनके मुख से भगवान के मधुर नामों को सुनकर आनन्‍दन में विह्रल हो नृत्‍य कर रहे थे, उनके दोनों नेत्रों में से दो धाराएं निकलकर समुद्र में लीन होने वाली गंगा जी के वेग को और अधिक बढ़ा रही थीं। प्रभु की ऐसी अद्भुत अवस्‍था देखकर घाट पर के बहुत-से आदमी वहाँ आकर एकत्रित हो गये। सभी प्रभु के दर्शन से अपने को कृतार्थ मानने लगे।
(क्रमशः)


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