गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

*६७. सज्जन-भाव*

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*अनदेख्या अनरथ कहैं, अपराधी संसार ।*
*जद तद लेखा लेइगा, समर्थ सिरजनहार ॥*
=================
साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
.
*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
.
*६७. सज्जन-भाव*
.
त्रिष्णां छिन्धि भज क्षमां जहि पापे रतिं मा कृथा:
सत्यं ब्रूह्यनुयाहि साधुपदवीं सेवस्य विद्वज्जनम्।
मान्‍यान्मानय विद्विषोऽप्यनुनय प्रख्यापय स्वान्गुणान्
कीर्तिं पालय दु‍:खिते कुरु दयामेतत्सतां लक्षणम्॥[१]
तृष्णा का छेदन करो, क्षमा को धारण करो, मद का परित्याग करो, पापों में प्रीति कभी मत करो, सत्य-भाषण करो, साधु पुरुषों की मर्यादा का पालन करो, ज्ञानी और क्रियावान पुरुषों का सदा सत्संग करो, मान्य पुरुषों का आदर करो, जो तुम्‍हारे साथ विद्वेष करें उनके साथ भी सद्व्‍यवहार ही करो।अपने सत्-आचरणों द्वारा लोगों के प्रेम के भाजन बनो, अपनी कीर्ति की सदा रक्षा करो और दीन-दु:खियों पर दया करो-बस, ये ही सज्जन पुरुषों के लक्षण हैं अर्थात जिनके जीवन में ये ग्यारह गुण पाये जायं वे ही सज्जन हैं। भर्तृ. नी. श./७८)
.
महाप्रभु गौरांगदेव में भगवत-भाव की भावना तो उनके कतिपय अंतरंग भक्त ही रखते थे, किंतु उन्‍हें परम भागवत वैष्णव विद्वान और गुणवान सज्जन पुरुष तो सभी लोग समझते थे। उनके सद्गुणों के सभी प्रशंसक थे।
.
जिन लोगों का अकारण ईर्ष्या करना ही स्वभाव होता है, ऐसे खल पुरुष तो ब्रह्मा जी की भी बुराई करने से नहीं चूकते। ऐसे मलिन-प्रकृति के निंदक खलों को छोड़कर अन्य प्रकार के लोग प्रभु के उत्तम गुणों के ही कारण उन पर आसक्त थे। उन्होंने अपने जीवने में किसी भी शास्‍त्र-मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया।
.
सर्वसमर्थ होने पर भी वे सभी लौकिक तथा वैदिक क्रियाओं को स्वयं करते थे और लोगों को भी उनके लिये प्रोत्साहित करते थे, किंतु वे कलिकाल में श्रीभगवन्नाम को ही मुख्य समझते थे और सभी कर्मों को गौण मानते हुए भी उन्होंने गार्हस्थ्य-जीवन में न तो स्वयं ही उनका परित्याग किया और न कभी उनका खंडन ही किया ।
.
वे स्‍वयं दोनों कालों की संख्‍या, तर्पण, पितृश्राद्ध, पर्व, उत्‍सव, तीर्थ, व्रत एवं वैदिक संस्‍कारों को करते तथा मानते थे, उन्‍होंने अपने आचरणों और चेष्‍टाओं द्वारा भी इन सबकी कहीं उपेक्षा नहीं की। श्रीवास, अद्वैताचार्य, मुरारी गुप्‍त, रमाई पण्डित, चन्‍द्रशेखर आचार्य आदि उनके सभी अंतरंग भक्‍त भी परम भागवत होते हुए इन सभी मर्यादाओं का पालन करते थे।

भावावेश के समय को छोड़कर वे कभी भी किसी के सामने अपनी बड़ाई की कोई बात नहीं कहते थे। अपने से बड़ों के सामने वे सदा नम्र ही बने रहते। श्रीवास, नंदनाचार्य, चन्‍द्रशेखराचार्य, अद्वैताचार्य आदि अपने सभी भक्‍तों को वे वृद्ध समझकर पहले से प्रणाम करते थे।
.
संसार का एक नियम होता है कि किसी एक ही वस्‍तु के जब बहुत-से इच्‍छुक होते हैं, तो वे परस्‍पर में विद्वेष करने लगते हैं, हमें उस अपनी इष्‍ट वस्‍तु के प्राप्‍त होने की तनिक भी आशा चाहे न हो तो भी हम इसके दूसरे इच्‍छुकों से अकारण द्वेष करने लगेंगे, ऐसा स्‍वाभाविक नियम है।
.
संसार में इन्द्रियों के भोग्‍य-पदार्थों की और कीर्ति की सभी को इच्‍छा रहती है। इसीलिये जिनके पास इन्द्रियों के भोग्‍य-पदार्थों की प्रचुरता होती है और जिनकी संसार में कीर्ति होने लगती है, उनसे लोग स्‍वाभाविक हो द्वेष-सा करने लगते हैं। सज्‍जन पुरुष तो सुखी लोगों के प्रति मैत्री, दु:खियों के प्रति करुणा, पुण्‍यवानों के प्रति प्रसन्‍नता और पापियों के प्रति उपेक्षा के भाव रखते हैं।
.
सर्वसाधारण लोग धनिकों और प्रतिष्ठितों के प्रति उदासीन-से बने रहते हैं और अधिकांश दुष्‍ट -प्रकृति के लोग तो सदा धनी-मानी सज्‍जनों की निंदा ही करते रहते हैं। जहाँ चार लोगों ने किसी की प्रशंसा की, बस उसी समय उनकी अंदर छिपी ईर्ष्‍या भभक उठती है और वे झूठी-सच्‍ची बातों को फैलाकर जनता में उनकी निंदा करना आरंभ कर देते हैं। ऐसे निंदकों के दल से अवतारी पुरुष भी नहीं बचने पाये हैं।
.
गौरांग महाप्रभु की भी बढ़ती हुई कीर्ति और उनके चारों और जनता में फैले हुए यश-सौरभ से क्षुभित होकर निन्दक लोग उनकी भाँति-भाँति से निन्दा करने लगे। कोई तो उन्हें वाममार्गी बताता, कोई उन्हें ढोंगी कहकर अपने हृदय की कालिमा को प्रकट करता और कोई-कोई तो उन्हें धूर्त और बाजीगर तक कह देता।
.
प्रभु सब‍की सुनते और हंस देते। उन्होंने कभी अपने निन्दकों की किसी बात का विरोध नहीं किया। उलटे वे स्वयं निन्दकों की प्रशंसा ही करते रहते। उनकी सहनशीलता और विद्वेष करने वालों के प्रति भी करुणा के भावों का पता नीचे की दो घटनाओं से भली-भाँति पाठकों को लग जायगा। यह तो पाठकों को पता ही है कि श्रीवास पण्डित के घर संकीर्तन सदा किवाड़ बंद करके ही होता था।
.
साल भर तक सदा इसी तरह संकीर्तन होता रहा। बहुत-से विद्वेषी और तमाशबीन देखने आते और किवाड़ों को बंद देखकर संकीर्तन की निन्दा करते हुए लौट जाते। उन्हीं ईर्ष्‍या रखने वाले विद्वेषियों में गोपाल चापाल नाम का एक क्षुद्र प्रकृति का ब्राह्मण था। वह प्रभु की बढ़ती हुई कीर्ति से क्षुभित-सा हो उठा, उसने संकीर्तन को बदनाम करने का अपने मन में निश्‍चय किया।
.
एक दिन रात्रि में वह श्रीवास पण्डित के द्वार पर पहुँचा। उस समय द्वार बंद था और भीतर संकीर्तन हो रहा था। चापाल ने द्वार के सामने थोड़ी-सी जगह लीपकर वहाँ चण्‍डी की पूजा की सभी सामग्री रख दी। एक हांडी में लाल, पीली, काली बिन्दी लगाकर उसको सामग्री के समीप रख दिया। एक शराब का पात्र तथा एक पात्र में मांस भी रख दिया। यह सब रखकर वह चला गया।
.
दूसरे दिन जब संकीर्तन करके भक्‍त निकले तो उन्होंने चण्‍डीपूजन की सामग्री देखी। खलों का भी दल आकर एकत्रित हो गया और एक-दूसरे को सुनाकर कहने लगे- ‘हम तो पहले ही जानते थे, ये रात्रि में किवाड़-बंद करके और स्त्रियों को साथ लेकर जोर-जोर से तो हरिध्वनि करते हैं और भीतर-ही-भीतर वाममार्ग की पद्धति से भैरवी-चक्र का पूजन करते हैं। ये सामने काली की पूजा की सामग्री प्रत्यक्ष ही देख लो। जो लोग सज्जन थे, वे समझ गये कि यह किसी धूर्त का कर्तव्य है। सभी एक स्वर से ऐसा करने वाले धूर्त की निन्दा करने लगे।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें