गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

*६६. जगाई और मधाई का पश्‍चात्ताप*

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*सहजैं ही सब होइगा, गुण इन्द्रिय का नास ।*
*दादू राम संभालतां, कटैं कर्म के पास ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*६६. जगाई और मधाई का पश्‍चात्ताप*
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नित्यानन्द प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके मधाई ने स्वयं अपने हाथों से परिश्रम करके गंगा जी का एक सुन्दर घाट बनाया। उसी पर एक कुटी बनाकर वह रहने लगा।
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वहाँ घाट पर स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध, मूर्ख-‍पण्ड़ित, चांडाल-पतित जो भी स्नान करने आता, मधाई उसी के चरण पकड़कर अपने अपराधों के लिये क्षमा-याचना करता। वह रोते-रोते कहता- ‘हमने जाने में, अनजान में आपका कोई भी अपराध किया हो, हमारे द्वारा आपको कभी भी कैसा भी कष्‍ट हुआ हो, उसके लिये हम आपके चरणों में नम्र होकर क्षमा-याचना करते हैं।’
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सभी उसकी इस नम्रता को देखकर रोने लगते और उसे गले से लगाकर भाँति-भाँति के आशीर्वाद देते। शास्त्रों में बताया है, जिसे अपने पापों पर हृदय से पश्चात्ताप होता है, उसके चौथाई पाप तो पश्चात्ताप करते ही नष्‍ट हो जाते हैं। यदि आप‍के पापकर्मों को लोगों के सामने खूब प्रकट कर दे तो आधे पाप प्रकाशित करने से नष्ट हो जाते हैं और जो पापियों के पापों को अपने मन की प्रसन्नता के लिये कथन करते हैं, चौथाई पाप उनके ऊपर चले जाते हैं। इस प्रकार पाप करने वाला पश्चात्ताप से तथा लोगों के सामने अमानी बनकर सत्यता के साथ पाप प्रकट करने से निश्पाप बन जाता है।
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इस प्रकार मधाई में दीनता और महापुरुषों की अहैतु की कृपा से भगवद्भक्तों के सभी गुण आ गये। भगवद्भक्त शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वों को सहन करने वाले, सभी प्राणियों के ऊपर करुणा के भाव रखने वाले, सभी जीवों के सुहृद्, किसी से शत्रुता न करने वाले, शान्त तथा सत्कर्मों का सदा करते रहने वाले होते हैं।
[१ - तितिक्षव: कारुणिका: सुहृद: सर्वदेहिनाम्।
अजातशत्रव: शान्ता: साधव: साधुभूषणा:॥]
वे विषय-भोगों की इच्छा भूलकर भी कभी नहीं करते। उनमें सभी गुण आप-से-आप ही आ जाते हैं। क्यों न आवें, भगवद्भक्ति का प्रभाव ही ऐसा है। हृदय में भगवद्भक्ति का संचार होते ही सम्पूर्ण सद्गुण आप-से-आप ही भगवद्भक्त के पास आने लगते हैं।
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जैसा कि श्रीमद्भागवत में कहा है-
यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिंचना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुरा:।
हरावभक्‍तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहि:॥
[२ - हे देवताओ ! जिस भक्त की विष्णु भगवान के चरणकमलों में अहैतुकी भक्ति है, उस भक्त के हृदय में सम्पूर्ण दिव्य-दिव्य गुण आप-से-आप ही आ-आकर अपना घर बना लेते हैं। जो अनित्य सांसारिक विषय-सुखों में ही निमग्न रह कर मन के रथ पर सवार होकर विषय-बाजार में विहार करता रहता है, ऐसे अभक्त के समीप महत्पुरुषों-से गुण कहाँ रह सकते हैं? ५/१८/१२]
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इस प्रकार थोडे़ ही दिनों में मधाई की भगवद्भक्ति की दूर-दूर तक ख्याति हो गयी। लोग उसके पुराने पापों को ही नहीं भूल गये, किंतु उसके पुराने मधाई नाम का भी लोगों को स्मरण नहीं रहा। मधाई अब ‘ब्रह्मचारी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये।
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अहा ! भगवद्भक्ति मे कितनी भारी अमरता है? भगवन्नाम पापों की क्षय करने की कैसी अचूक ओषधि है? इस रसायन के पान करने से पापी-से-पापी भी पुण्यात्मा बन सकता है। नवद्वीप में ‘मधाईघाट’ आज तक भी उस महामहिम परम भागवत मधाई के नाम को अमर बनाता हुआ भगवान के इस आश्वासन-वाक्य का उच्च स्वर से निर्घोष कर रहा है-
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥
चाहे कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, उसने चाहे सभी पापों का अन्त ही क्यों न कर डाला हो, वह भी यदि अनन्य होकर-और सभी आश्रय छोड़कर एकमात्र मेरे में ही मन लगाकर मेरा ही स्मरण-ध्यान करता है तो उसे सर्वश्रेष्ठ साधु ही समझना चाहिये। क्योंकि उसकी भली भाँति मुझमें ही स्थिति हो चुकी है।
(क्रमशः)

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