बुधवार, 22 अप्रैल 2020

*९२. श्रीसाक्षिगोपाल*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*तहँ वचन अमोलक सब ही सार,*
*तहँ बरतै लीला अति अपार ।*
*उमंग देइ तब मेरे भाग,*
*तिहि तरुवर फल अमर लाग ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ३६९)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९२. श्रीसाक्षिगोपाल*
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भगवान की आज्ञा पाकर वह ब्राह्मण कुमार गांव में आया और लोगों से उसने श्री गोपाल भगवान के आने का वृतान्‍त कह सुनाया सुनते ही गांव के सभी नर-नारी, बालक-वृद्ध तथा युवा पुरुष भगवान के दर्शन के लिये दौड़े आये। सभी भुमि में लोटकर भगवान के सामने साष्‍टांग प्रणाम करने लगे।
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कोई मेवा लाकर भगवान पर चढ़ाता, कोई फल-फूलों से ही श्रीगोपाल भगवान की पूजा करता। इस प्रकार भगवान के सामने विविध प्रकार की भेंटें चढ़ने लगीं और हर समय उनकी पूजा होने लगी। फिर भगवान की साक्षी लेने की किसी की हिम्‍मत ही नहीं पड़ी।
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ब्राह्मण के लड़के ने बड़ी ही प्रसन्‍नता के साथ अपनी बहिन का विवाह उस युवक के साथ कर दिया और वह वृद्ध ब्राह्मण तथा युवक दोनों मिलकर सदा भगवान की सेवा-पूजा में ही रहने लगे। दूर-दूर तक भगवान के आने का समाचार फैल गया।
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नित्‍यप्रति हजारों आदमी गोपालभगवान के दर्शन के लिये आने लगे। जब यह समाचार उस देश के राजा को विदित हुआ तो उसने एक बड़ा मन्दिर गोपालभगवान के लिये बनवा दिया और तभी से वे साक्षिगोपाल के नाम से प्रसि‍द्ध हुए। नित्‍यानन्‍द जी भक्‍तों सहित बैठे हुए महाप्रभु ने इस कथा को कह सुन रहे थे।
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प्रभु एकटक होकर इस परम पावन उपाख्‍यान को सुन रहे थे। नित्‍यानन्‍द जी के चुप हो जाने पर प्रभु ने पूछा- ‘फिर विद्यानगर से साक्षिगोपाल यहाँ क्‍यों पधारे ? इस बात को हमें और सुनाओ।’
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नित्‍यानन्‍दजी क्षणभर चुप रहने के अनन्‍तर कहने लगे- ‘उस समय उड़ीसा-देश में परम भागवत महाराज पुरुषोतम देव राज्‍य करते थे। उन्‍होंने विद्यानगर के राजा की राजकुमारी के साथ विवाह करने की इच्‍छा प्रकट की। इस पर विद्यानगर के राजा ने अपनी कन्या महाराज पुरुषोतमदेव को नहीं दी और अस्‍वीकार करते हुए कहा- ‘मैं अपनी कन्‍या को मन्दिर के झाडूदार के लिये नहीं दूंगा।’
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इस पर क्रुद्ध होकर महाराज पुरुषोतमदेव ने विद्यानगर चढ़ाई की और भगवान जगन्‍नाथ जी की कृपा से विद्यानगर को जीतकर उसे अपने राज्‍य में मिला लिया और राज कन्‍या का विवाह अपने साथ कर लिया। तभी महाराज ने साक्षिगोपाल से पुरी पधारने के लिये प्रार्थना की। महाराज के भक्तिभाव से प्रसन्‍न होकर साक्षिगोपाल-भगवान पुरी पधारे और कुछ कालतक जगन्‍नाथ जी के मन्दिर में ही माणिक्‍य-सिंहासन पर विराजे।
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जगन्‍नाथ जी पुराने थे, ये बेचारे नये ही आये थे, इसलिये दोनों में कुछ प्रेम-कलह उत्‍पन्‍न हो गया। महाराज पुरुषोतमदेव ने दोनों को एक स्‍थान पर रखना उचित न समझकर अन्‍त में पुरी से तीन कोस की दूरी पर ‘सत्‍यवादी’ नामक ग्राम के समीप साक्षिगोपाल भगवान का मन्दिर बनवा दिया। तब से यहीं विराजमान हैं।
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इनकी महिमा बड़ी अपार है, एक बार उड़ीसा-देश की महारानी इनके दर्शन के लिये पधारीं। इनकी मनमोहिनी बाँकी-झाँकी करके महारानी मुग्‍ध हो गयीं। उनकी इच्‍छा हुई कि ‘यदि भगवान की नाक छिदी हुई होती तो मैं अपने नाक का बहूमुल्‍य मोती भगवान को पहनाती।’

दूसरे ही दिन महारानी को स्‍वप्‍न हुआ मानो साक्षिगोपाल भगवान सामने खड़े हुए कह रहे हैं- ‘महारानी ! हम तुम्‍हारी मनोकामना पूर्ण करेंगे। पुजारियों को पता नहीं कि हमारी छिदी हुई है। कल तुम ध्‍यानपूर्वक दिखवाना, हमारी नाक में छिद्र है। तुम सहर्ष अपना मोती पहनाकर अपनी इच्‍छा पूर्ण कर सकती हो।’
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प्रात:काल उठते ही महारानी ने यह वृतान्‍त महाराज से कहा। महाराज ने उसी समय पुजारियों से भगवान की नाक दिखवायी। सचमुच उसमें छिद्र था। तब महारानी ने बड़े ही प्रेम से अपना बहूमुल्‍य मोती भगवान की नाक में पहनाया। इतना कहकर नित्‍यानन्‍द जी चुप हो गये। इस कथा को सुनकर प्रभु प्रेम में गदगद हो गये और साक्षिगोपाल की मनमोहिनी मूर्ति का ध्‍यान करते-करते ही वह रात्रि प्रभु ने वहीं बितायी।
(क्रमशः)

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