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*दादू कर्त्ता करै तो निमष में,*
*जल मांही थल थाप ।*
*थल मांही जलहर करै, ऐसा समर्थ आप ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९३. श्रीभुवनेश्वर महादेव*
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यौ तौ शंखकपालभूषितकरौ मालास्थिमालाधरौ
देवौ द्वारवतीश्मशाननिलयौ नागारिगोवाहनौ।
द्वित्र्यक्षौ बलिदक्षयज्ञमथनौ श्रीशैलजावल्लभौ
पापं वो हरतां सदा हरिहरौ श्रीवत्सगंगाधरौ॥[१]
([१] भगवान हरि और भगवान भोलेश्वर सदा हमारे पापों को हरण करते रहें। वे हरि-हर भगवान कैसे हैं? एक ने तो हाथ में शंख धारण कर रखा है, दूसरे ने कपाल ही ले रखा है। एक ने गले में सुन्दर वैजयन्ती माला धारण कर रखी हैं तो दूसरे नरमुण्डों की ही माला पहने हुए है। एक द्वारका में निवास करते हैं, तो दूसरे श्मशान में ही पड़े रहते हैं। एक गरुड पर सवारी करते हैं, तो दूसरे बूढ़े बैल पर ही चढ़कर घूमते हैं। एक के दो पुत्र है, तो दूसरे के तीन नेत्र हैं, एक ने बालिका यज्ञ विध्वंस किया है, तो दूसरे ने अपने गणों से दक्ष प्रजापति के यज्ञमण्डप को चौपट कराया है। एक की प्राणप्रिया समुद्रतनया लक्ष्मी है, तो दूसरे शैलसुता पार्वती को ही प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं। सु. र. भां. १४/८)
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प्रात:काल साक्षिगोपाल भगवान की मंगल-आरती के दर्शन करके महाप्रभु आगे के लिये चलने लगे। महाप्रभु के ह्दय में जगन्नाथ जी के दर्शन की इच्छा अधिकाधिक उत्कट होती जाती थी। ज्यों-ज्यों वे आगे बढ़ते थे, त्यों-ही-त्यों प्रभु की भगवान की इच्छा पूर्वापेक्षा प्रबल होती जा रही थी।
रास्ते में चलते-चलते ही मुकुन्ददत ने अपने कोकिल-कूजित कमनीय कण्ठ से संकीर्तन का यह पद आरम्भ कर दिया-
राम राघव ! राम राघव !
राम राघव ! रक्ष माम्।
कृष्ण केशव ! कृष्ण केशव !
कृष्ण केशव ! पाहि माम्॥
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सभी ने मुकुन्ददत्त के स्वर में स्वर मिलाया। संकीर्तन की सुरीली तान से उस जनशून्य नीरव पथ में चारों ओर इसी संकीर्तन-पद की गूंज सुनायी देने लगी। महाप्रभु भावावेश में आकर नृत्य करने लगे। किसी को कुछ खबर ही नहीं थी कि हम लोग किधर चल रहे हैं, मन्त्र से कीले हुए मनुष्य की भाँति उन सबके शरीर अपने-आप ही आगे की ओर चले जा रहे थे। रास्ता किधर से है और हम कहाँ पहुँचेंगें, इस बात का किसी को ध्यान ही नहीं था।
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इस प्रकार प्रेम में विभोर होकर आनन्द-नृत्य करते हुए प्रभु अपने साथियों के सहित भूवनेश्वर नामक तीर्थ में पहुँचे। वहाँ पर ‘बिन्दुसर’ नाम का एक पवित्र सरोवर है। इस सरोवर के सम्बन्ध में ऐसी कथा है कि शिव जी ने सम्पूर्ण तीर्थो का बिन्दु-बिन्दु भर जल लाकर इस सरोवर की प्रतिष्ठा की, इसीलिये इसका नाम ‘बिन्दुसर’ अथवा ‘बिन्दुसागर’ हुआ।
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महाप्रभु ने सभी भक्तों के सहित बिन्दुसागर-तीर्थ में स्नान किया और स्नान के अनन्तर आप भुवनेश्वर महादेव जी के मन्दिर में गये। भगवान भुवनेश्वर की भुवनमोहिनी मंजुल मूर्ति के दर्शन से प्रभु मूर्च्छित हो गये, थोड़ी देर के पश्चात बाह्यज्ञान होने पर आपने संकीर्तन आरम्भ कर दिया। भक्तों के सहित प्रभु दोनों हाथ ऊपर उठाकर ‘शिव-शिव शम्भो, हरहर महादेव’ इस पद को गा-गाकर जोरों से नृत्य कर रहे थे।
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सैकड़ों मनुष्य प्रभु को चारों ओर से घिरे हुए खड़े थे। भुवनेश्वर महादेव जी का मन्दिर बहुत प्राचीन है और ये शिव जी बहुत पुराने हैं। भुवनेश्वर को गुप्तकाशी भी कहते हैं। हजारों यात्री दूर-दूर से भगवान भुवनेश्वर के दर्शन के लिये आते हैं और इनके मन्दिर में सदा पूजा होती ही रहती है। महाप्रभु चारों ओर जलते हुए दीपकों को देखकर प्रभु में उन्मत-से हो गये। चारों ओर छिटकी हुई पूजन की सामग्री से वह स्थान बड़ा ही मनोहर मालूम पड़ता था। महाप्रभु बहुत देर तक मन्दिर में कीर्तन करते रहे और वहीं उस दिन उन्होने विश्राम किया।
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रात्रि में जब प्रभु सब कर्मों से निवृत्त होकर भक्तों के सहित कथोपकथन करने के निमित्त बैठे, तब मुकुन्ददत्त ने प्रभु के पादपपद्मों को धीरे-धीरे दबाते हुए कहा- ‘प्रभो ! आपने ही बताया था कि जिस तीर्थ में जाय, उस तीर्थ का माहात्म्य अवश्य सुनना चाहिये। बिना माहात्म्य सुने तीर्थ का फल आधा होता है, सो हम लोग भगवान भुवनेश्वर का माहात्म्य सुनना चाहते हैं।
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एकान्तप्रिय और शैलकाननों में विहार करने वाले ये भोले बाबा इस उत्कल-देश में आकर क्यों विराजमान हुए, काशी छोड़कर इन्होंने यहाँ यह नयी गुप्तकाशी क्यों बनायी-इस बात को जानने की हम लोगों की बड़ी इच्छा है। कृपा करके हमें भूवनेश्वर भगवान की पापहारिणी कथा सुनाकर हमारे कर्णो को पवित्र कीजिये।
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भगवत-सम्बन्धी कथाओं के श्रवणमात्र से ही अन्त:करण मलिनता मिट जाती है और हृदय में पवित्रता का संचार होने लगता है। मुकुन्ददत्त के ऐसे प्रश्न को सुनकर कुछ मुसकराते प्रभु ने कहा- ‘मुकुन्द ! तुमने यह बहुत ही उत्तम प्रश्न पूछा। इन भगवान भूतनाथ के यहाँ पधारने की बड़ी ही अद्भुत कथा है। स्कन्दपुराण में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है, उसी को संक्षेप में तुम लोगों को सुनाता हूँ। इस हरि-हर-महिमावाली पुण्य कथा को तुम लोग ध्यानपूर्वक सुनो।
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पूर्वकाल में शिव जी काशीवासी के ही नाम से प्रसिद्ध थे। वाराणसी को ही उन्होंने अपनी लीलास्थली बनाया। शिव जी के सभी काम विचित्र ही होते हैं, इसीलिये लोग इन्हें औघड़नाथ कहते हैं। औघड़नाथ बाबा का काशी जी में भी कुछ गर्मी-सी प्रतीत होने लगी। इसलिये आप काशी को छोड़कर कैलास पर्वत के शिखर पर जाकर रहने लगे।
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इधर काशी सूनी हो गयी। वहाँ एक राजा ने अपनी राजधानी बना ली और वह बड़े ही भक्तिभाव से भगवान भूतनाथ की पूजा करने लगा। राजा ने हजारों वर्ष तक शिव जी की घोर अराधना की। उसके उग्र तप से आशुतोष भगवान प्रसन्न हुए और उसके सामने प्रकट होकर उसने वरदान मांगने को कहा।
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राजा ने दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए विनीतभाव से करुण स्वर में कहा- ‘प्रभो ! मैं अब आपसे क्या मागूं ? आपके अनुग्रह से मेरे धन्य-धान्य, राज-पाट, पुत्र-परिवार आदि सभी संसार की उत्तम समझी जाने वाली वस्तुएँ मौजूद हैं। मेरी एक बड़ी उत्कट इच्छा है, उसे सम्भवतया आप पूरी न कर सकेंगे।’
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शिव जी ने प्रसन्नता के वेग में कहा- ‘राजन ! मेरे लिये प्रसन्न होने पर त्रिलोकी में कोई भी वस्तु अदेय नहीं है। तुम्हारी जो इच्छा हो, उसे ही निसंकोच-भाव से मांग लो।’ राजा ने अत्यन्त ही दीनता प्रकट करते हुए सरलता से कहा- ‘हे वरद ! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर ही देना चाहते हैं, तो मुझे यही वरदान दीजिये कि युद्ध में मैं श्रीकृष्णचन्द्र जी को परास्त कर सकूँ।’
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सदा आक-धतूरे के नशेमें मस्त रहने वाले औघड़दानी सदाशिव वरदान देने में आगा-पीछा नहीं सोचते। कोई चाहे भी जैसा वर क्यों न माँगे; उससे इन्हें स्वयं भी चाहे क्लेश क्यों न उठाना पड़े, ये वरदान देते समय ‘ना’ करना तो सीखे ही नहीं हैं।
(क्रमशः)

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