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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग सिन्दूरा १०(गायन समय रात्रि १२ से ३)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२४९ - शूलताल
पारब्रह्म भज प्राणिया, अविगत एक अपार ।
अविनाशी गुरु सेविये, सहजैं प्राण अधार ॥टेक॥
ते पुर प्राणी तेहनो, अविचल सदा रहँत ।
आदि पुरुष ते आपणों, पूरण परम अनँत ॥१॥
अविगत आसण कीजिये, आपैं आप निधान ।
निरालम्ब भज तेहनों, आनँद आत्मराम ॥२॥
निर्गुण निश्चल थिर रहे, निराकार निज सोइ ।
ते सति प्राणी सेविये, लै समाधि रत होइ ॥३॥
अमर आप रमता रमैं, घट घट सिरजनहार ।
गुणातीत भज प्राणिया, दादू येह विचार ॥४॥
हे प्राणी, गुरुजनों की सेवा करते हुये मन इन्द्रियों के अविषय, अपार, अद्वैत, अविनाशी, प्राणाधार, परब्रह्म का सहज स्वभाव से सदा ही भजन कर ।
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वह सदा निश्चल रहने वाला प्रभु रूप पुर ही तेरा स्थान है । उस परम अनन्त, आदि पुरुष, मन इन्द्रियों के परे, विश्व में परिपूर्ण अपने निजी आश्रय रूप प्रभु में ही वृत्ति स्थिति रूप आसन लगा ।
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अन्य आश्रय रहित, निर्गुण, निश्चल, निराकार, आत्म स्वरूप राम ही सदा स्थिर रहता है, वही तेरा है, उसे भज । हे प्राणी ! वृत्ति द्वारा समाधि में अनुरक्त होकर उस सत्य प्रभु की ही उपासना कर ।
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वह सत्ता मात्र से सृकर्ता, गुणातीत, अमर, सब में रमने वाला, स्वयँ घट - घट में रम रहा है । हे प्राणी ! तू अब उसी का भजन कर, हमारा विचारपूर्वक यही उपदेश है । २४६ - २४९ के ४ पदों से रतिया निवासी बाबा बनवारीजी को उपदेश किया था । उपदेश से ही वे कृतकृतत्य होकर "हरिजी भलो भयो सँतन को, सुन - सुन सरस कथा दादू की, भ्रम भाग्यो या मन को" यह पद महाराज की भेंट किया था ।
(क्रमशः)

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