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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त Ram Gopal तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*३. नांम कौ अंग ~ १५७/१६०*
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हरि साहिब हरि जन रिदै, हरि सेवग सब ठांम ।
कहि जगजीवन हरि भगति, हरि मंहि सुमिरै रांम ॥१५७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हरि हमारे मालिक हैं, साहिब हैं अतः प्रभु के बंदे हृदय में व प्रभु सेवक सभी स्थान पर हैं। संत कहते हैं कि हरि भक्ति वही है जिसमें प्रभु स्मरण करते रहें।
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असत१ रंगै हरि नांउ सों, तुचा२ रंगैं रटि रांम ।
कहि जगजीवन मन रंग्यौ, नख सिख भज हरि नांम ॥१५८॥
१. असत-अस्थि(हड्डी) । २. तुचा-त्वचा ।
संतजगजीवन जी हरि भक्तों का स्वरूप बताते हुये कह रहे है कि भक्तों कि अस्थियाँ तो हरि नाम में रंगी है व त्वचा राम स्मरण से रंगी गयी है। उनका मन व नखशिख पूरी देह हरि भजन से रंगा हुआ है।
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वेदन मांही विस्व धरि, साधन मांही रांम ।
कहि जगजीवन पिछांणैं, अधर धर्या के नांम ॥१५९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सारे वेदों में संसार भर का ज्ञान है सभी साधनों जैसे जप, तप, स्मरण राम को पाने के साधन हैं। और पहचान हरि भक्तों कि यह है कि उनके अधरों पर हरि नाम रहता है।
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साधन मांही ईसवर, परगट पाये रांम ।
कहि जगजीवन विस्व मंहि, चित बिलास क्रित कांम ॥१६०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सभी साधनों में ईश्वर है जिस से हम राम जी को प्रकट रुप में पा सकते हैं। संत कहते हैं कि संसार के सारे कार्य करें पर ध्यान प्रभु का ही करते रहें।
(क्रमशः)

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