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*रहसी एक उपावनहारा, और चलसी सब संसारा ॥*
*दादू देख रहै अविनाशी, और सबै घट खीना ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २२४)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१०९. दक्षिण के शेष तीर्थों में भ्रमण*
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महद्विचलनं नृणां गृहिणां दीनचेतसाम।
नि:श्रेयसाय भगवन कल्पते नान्यथा क्वचित॥[१]
(हे भगवन ! आप जैसे महानुभावों का जाना यदि कहीं होता भी है तो केवल दीन-हीन गृहस्थियों के कल्याण के ही निमित्त होता है, इसके सिवा आप जैसे महापुरुष अपने स्वार्थ के निमित्त कदापि कहीं नहीं जाते।
श्रीमद्भा. १०/८/४)
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दक्षिण मथुरा से चलकर महाप्रभु पाण्डुदेश में ताम्रपर्णीं, नयत्रिपदी, चिवड़तला, तिलकांची, गजेन्द्रमोक्षण, पानागड़ि, चामतापुर, श्रीवैकुण्ठ, मलयपर्वत, धनुस्तीर्थ, कन्याकुमारी आदि तीर्थों में होते हुए और अपने अमोघ दर्शनों से लोगों को कृतार्थ करते हुए मल्लारदेश में पहुँचे।
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उधर भट्टथारी नाम से साधुवेषधारी लोगों का एक दल होता है। वे लोग एक स्थान पर नहीं रहते हैं। उसका वेष साधुओं का-सा होता है, किंतु उसका व्यवहार अच्छा नहीं होता है। जिस प्रकार भूमरिया या बंजारे अपने डेरा-तम्बू लादकर घूमते रहते हैं, उसी प्रकार वे लोग भी एक स्थान से दूसरे स्थानों में घूमा करते हैं।
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उनमें से बहुत से तो रात्रि में चोरी भी कर लेते हैं। भूली भटकी स्त्रियों को वे बहकाकर अपने साथ रख लेते हैं। इस प्रकार वे अपने दल को बढ़ाया करते हैं। महाप्रभु रात्रि में उनके समीप ही ठहरे थे। उन लोगों ने महाप्रभु के सेवक कृष्णदास को बहका दिया। उसे सुन्दर स्त्री और धन का लोभ दिया।
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उन्होंने उसे भाँति-भाँति से समझाया– ‘तू इस विरक्त साधु के पीछे पीछे क्यों मारा मारा फिरता हैं, न भोजन का ठीकाना और न रहने की ही सुविधा। हमारा चेला बन जा। हमारे यहाँ अनेकों सुंदर-सुंदर स्त्रियाँ है, जिसे चाहे रखना, खाने पीने की हमारे यहाँ कमी ही नहीं। रोज हलुआ, मोहनभोग घुटता हैं। बेचारा अनपढ़ सीधा सादा गरीब ब्राह्मण उनकी बातों में आ गया।
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वह महाप्रभु को छोड़कर धीरे से उठकर उन लोगों के साथ चला गया। जब महाप्रभु को यह बात मालूम हुई तो वे उन लोगों के पास गये और उनसे सरलतापूर्वक कहने लगे- ‘भाइयो ! आपने यह अच्छा काम नहीं किया है। मेरे साथी को आपने बहकाकर अपने यहाँ रख लिया है, ऐसा करना आप लोगों के लिये उचित नहीं है, आप भी संन्यासी हैं और मैं भी संन्यासी हूँ। आपके साथ बहुत-से आदमी हैं, मेरे पास तो यह अकेला ही है, इसलिये मेरे आदमी को कृपा करके आप दे दें नहीं तो इसका परिणाम अच्छा न होगा।’
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महाप्रभु की ऐसी बात सुनकर वे वेषधारी संन्यासी प्रभु के ऊपर प्रहार करने को उद्यत हो गये, किन्तु प्रभु के प्रभाव से प्रभावान्वित होकर वे भाग गये और महाप्रभु कृष्णदास को उन लोगों से छुड़ाकर आगे के लिये चले। वहाँ से चलकर महाप्रभु पयस्विनी नामक नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ उन्हें प्राचीन लिखी हुई ब्रह्मसंहिता मिल गयी, उस अदभुत ग्रन्थ को लेकर प्रभु श्रृंगेरीमठ में पहुँचे।
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यह भगवान शंकराचार्य का दक्षिण दिशा का प्रधान मठ है। भगवान शंकराचार्य ने वेद शास्त्रों की रक्षा और धर्म प्रसार के निमित्त भारतवर्ष की चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित किये। उत्तर दिशा में बदरिकाश्रम के समीप जोशीमठ, पूर्व में जगन्नाथपुरी में गोवर्धनमठ, द्वारिकापुरी में शारदामठ और दक्षिणपुरी में श्रंगेरीमठ।
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इनमें से जोशी मठ को छोड़कर शेष तीनों मठों के मठाधीश आज तक शंकराचार्य के ही नाम से पुकारे जाते हैं। महाप्रभु का सम्बन्ध भी दशनामी सम्प्रदाय के संन्यासियों से ही था।
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श्रृंगेरीमठ से चलकर महाप्रभु मत्स्यतीर्थ होते हुए उडूपी नामक स्थान में मध्वाचार्य के मठपर पहुँचे और वहाँ गोपाल भगवान के दर्शन किये। वहाँ के तत्त्ववादियों के साथ प्रभु शास्त्रविचार करते हुए दो तीन दिन तक रहे। वहाँ से फाल्गुतीर्थ, त्रिकूप, पम्पापुर, सुर्पारक, कोल्हापुर आदि तीर्थ-स्थानों में होते हुए पण्ढरपुर में आये।
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यहाँ पर एक ब्राह्मण ने महाप्रभु का निमन्त्रण किया। महाप्रभु उसका निमन्त्रण स्वीकार करके उसके यहाँ भिक्षा करने गये। उसने बड़ी श्रद्धाभक्ति से प्रभु को भिक्षा करायी। बातों ही बातों में उसने कहा- ‘यहाँ पर एक बड़े ही योग्य और भगवदभक्त महात्मा ठहरे हुए हैं। सम्भवतया आपने श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी महाराज का नाम तो सुना ही होगा, वे महात्मा उन्हीं के शिष्य हैं, उनका नाम श्रीरंगपुरी है।
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इतना सुनते ही प्रभु प्रेम में विभोर हो गये। उन्होंने जल्दी से कहा –‘विप्रवर! आप मुझे से श्रीरंगपुरी महाराज के समीप ले चलें।’ प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके वह ब्राह्मण प्रभु को साथ लेकर रंगपुरी महाराज के समीप पहुँचा। प्रभु ने दूर से ही पुरी महाराज को देखकर उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया।
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पुरी महाराज ने प्रणत हुए प्रभु को उठाकर गले से लगाया और उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगा- ‘आपकी आकृति से ही प्रतीत हो रहा है कि आप कोई साधारण पुरुष नहीं हैं। संन्यासी होकर भी इतनी नम्रता, यह तो महान आश्चर्य की बात है। इतनी सरलता, इतनी भक्ति और ऐसे प्रेम के सात्त्विक विचार मेरे गुरुदेव के कृपापात्र संन्यासियों को छोड़कर और किसी संन्यास में नहीं पाये जाते। आप अपना परिचय मुझे दीजिये।’
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प्रभु ने अत्यन्त ही विनीत भाव से कहा- ‘संन्यासियों में भक्तिभाव के प्रवर्तक भगवान माधवेन्द्रपुरी के प्रधान शिष्य श्रीमत ईश्वरपुरी महाराज मेरे मन्त्र-दीक्षा-गुरु हैं। संन्यास के गुरु मेरे श्रीमत केशवभारती महाराज हैं।’ श्रीरंगपुरी महाराज ने पूछा- ‘आपकी पूर्वाश्रम की जन्मभूमि कहाँ है?’
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प्रभु ने सरलता के साथ कहा- ‘इस शरीर का जन्म गौड़देश में भगवती भागीरथी के तट पर नवद्वीप नामके नगर में हुआ है। प्रसन्नता प्रकट करते हुए पुरी महाराज कहने लगे- ‘ओहो ! तब तो आप अपने बड़े ही निकट सम्बन्धी हैं। श्रीअद्वैताचार्य को तो आप जानते ही होंगे, मैं अपने गुरुदेव के साथ पहले नवद्वीप गया था।
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वहाँ पर जगन्नाथ मिश्र नामके एक बड़े श्रद्धालु ब्राह्मण हैं, उनकी पत्नी तो साक्षात अन्नपूर्णादेवी ही हैं। मैंने एक दिन उनके घर भिक्षा की थी। उस ब्राह्मणी ने मुझे बड़े ही प्रसन्नता के सहित भिक्षा करायी थी। उनका एक सर्वगुणसम्पन्न पुत्र संन्यासी हो गया था। वह तो बड़ा ही होनहार था। किन्तु दैव की गति बड़ी विचित्र होती है, संन्यास लेने के दो वर्ष बाद, उसने यहीं पर शरीर त्याग दिया। उसका संन्यास का नाम शंकरारण्य था।’
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इस बात को सुनकर प्रभु कुछ विस्मित से हो गये। उनके दोनों स्वच्छ और बड़े बड़े कमल के समान नेत्रों में आप से आप ही जल भर आया। रुँधे हुए कण्ठ से उन्होंने कहा- ‘भगवन ! वे महाभाग शंकरारण्य स्वामी मेरे पूर्वाश्रम के अग्रज थे।’
इस बात को सुनते ही पुरी महाराज ने प्रभु का फिर आलिंगन किया और कहने लगे- ‘क्या आप सब के सब संन्यासी ही हो गये या घर पर कोई और भी भाई है?’
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प्रभु ने नीचे को सिर करके धीरे से कहा- ‘घर पर तो वे ही श्रीहरि हैं, जिनका आपने पहले नाम लिया। मेरे पूर्वाश्रम के पिता तो परलोकवासी हो गये। हम दो ही भाई थे, सो दोनों ही आपके चरणों की शरण में आ गये। अब घर पर वृद्धा माता ही है।’
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पुरी ने कहा- ‘भाई आपका ही कुल धन्य हैं, आपके ही माता पिता का पुत्र उत्पन्न करना सार्थक हुआ।’
इस प्रकार दोनों में और भी परमार्थ सम्बन्धी बहुत सी बातें होती रहीं। दो तीन दिन तक दोनों ही साथ साथ रहे। अन्त में पुरी महाराज तो द्वारिका के लिये चले गये और महाप्रभु श्री विट्ठलनाथ जी के दर्शन करके आगे बढ़े।’
(क्रमशः)

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