गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

*१०८. दक्षिण के तीर्थों का भ्रमण (२)*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।*
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१०८. दक्षिण के तीर्थों का भ्रमण (२)*
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महाप्रभु उसके ऐसे दृढ़ अनुराग को देखकर मुग्‍ध हो गये। ओहो ! कितना ऊंचा भाव है, इसे महापुरुष के सिवा कोई समझ ही क्‍या सकते हैं? प्रभु ने उसे धैर्य बंधाते हुए कहा - ‘विप्रवर ! आप‍ इनते भारी विद्वान होकर भी ऐसी भूली-भूली बातें करते हैं। भला जगज्‍जननी सीता माता को चुरा ले जाने की शक्ति किसी में हो ही कैसे सकती?’
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यह तो भगवान की एक लीला थी। आप भोजन करें और इस बात को मन में से निकाल दें। महाप्रभु के आग्रह से उसने थोड़ा बहुत प्रसाद पा लिया, किन्‍तु उसे पूर्ण सन्‍तोष नहीं हुआ। श्रीमद्वाल्‍मीकीय रामायण में तो स्‍पष्‍ट सीतामाता का हरण लिखा हुआ है। इसीलिये वह ब्राह्मण चिन्तित ही बना रहा। महाप्रभु भी दूसरे दिन आगे को चल दिये।
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दक्षिण मथुरा से चलकर महाप्रभु ने कृतमाला तीर्थ में स्‍नान किया और महेन्‍द्र पर्वत पर जाकर परशुराम भगवान के दर्शन किये। वहाँ से सेतुबन्‍ध रामेश्‍वर के दर्शन करते हुए वे धनुस्‍तीर्थ में पहुँचे और उस तीर्थ में स्‍नान करके श्रीरामेश्‍वर में पहुँचे। वहाँ शिव जी के दर्शन करके प्रभु लौट ही रहे थे कि कुछ ब्राह्मणों को वहाँ बैठे हुए देखा।
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वहाँ पर कूर्मपुराण की कथा हो रही थी। प्रभु भी कथा सुनने के लिये बैठ गये। दैवयोग से उस समय सीता जी के हरण का प्रसंग हो रहा था। प्रभु ने कूर्मपुराण में सुना - ‘जिस समय जनकनन्दिनी सीता जी ने दशग्रीव रावण को देखा तब उन्‍होंने अग्नि की आराधना की। उसी समय अग्नि ने सीता को अपने पुर में रख लिया और उसकी छाया को बाहर रहने दिया।
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राक्षसराज रावण सीता जी की उस छाया को ही हरकर ले गया था। जब रावण को मारकर भगवान ने सीता जी की अग्नि परीक्षा की, तब अग्नि ने असली सीता जी को निकालकर दे दिया। वास्‍तव में रावण सीता जी की छाया को ही हरकर ले गया था। असली सीता का तो उसने स्‍पर्श तक नहीं किया।’
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भक्‍तवत्‍सल महाप्रभु इस प्रसंग को सुनकर अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने सोचा - ‘इसकी प्रतिलिपि करके उस परमभक्‍त रामदास को दिखानी चाहिये।’ फिर प्रभु ने सोचा - ‘यदि मैं नवीन पत्र पर प्रतिलिप करके ले गया तो बहुत सम्‍भव है, नूतन श्‍लोक समझकर उसे विश्‍वास न हो।’
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इसलिये प्रभु ने उस कथा कहने वाले ब्राह्मण से कहा - ‘हम इस पृष्‍ठ की नकल करके आपको दे देंगे। इस पुराने पृष्‍ठ को आप हमें दे दें। कथावाचक ने प्रभु की इस बात को स्‍वीकार कर लिया और प्रभु ने उसकी नूतन प्रतिलिप करके तो उस कथावाचक को दे दी और वह पुराना पृष्‍ठ अपने पास रख लिया।
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उस पृष्‍ठ को लेकर दयालु गौरांग फिर दक्षिण मथुरा में रामभक्‍त ब्राह्मण के घर आये और उसे कूर्मपुराण के पुराने पृष्‍ठ को दिखाते हुए प्रभु ने कहा - ‘लीजिये अब तो आपको सन्‍तोष होगा। यह तो कूर्मपुराण में ही लिखा है कि रावण सीता की छाया को हरकर ले गया था।’
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महाप्रभु की दयालुता को देखकर वह ब्राह्मण प्रेम में व्‍याकुल होकर रुदन करने लगा। प्रभु के पैरों को पकड़कर उसने रोते-रोते कहा - ‘आज आपने मेरे दु:खों को दूर किया। आप मेरे इष्‍टदेव श्रीरघुनाथ जी ही हैं। मेरे इष्‍टदेव के सिवा ऐसी असीम कृपा दूसरा कोई कर ही नहीं सकता। आज आपके अमोघ दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया।
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आपने अनुग्रह करके शोकसागर में डूबते हुए मुझ निराश्रय का उद्धार कर दिया। प्रभो ! मैं आपकी स्‍तुति ही क्‍या कर सकता हूँ? उस ब्राह्मण की ऐसी स्‍तुति सुनकर प्रभु ने कहा - ‘विप्रवर ! मैं आपकी भक्ति देखकर बहुत ही अधिक सन्‍तुष्‍ट हुआ हूँ। ऐसा सच्‍चा भक्त मुझे और कहीं नहीं मिला।’ इस प्रकार उस ब्राह्मण को सन्‍तुष्‍ट और कृतार्थ करके महाप्रभु आगे के तीर्थों में जाने का विचार करने लगे।
(क्रमशः)

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