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*सावण हरिया देखिये, मन चित ध्यान लगाइ ।*
*दादू केते जुग गये, तो भी हर्या न जाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*कर्मयोग । संसार तथा निष्काम कर्म*
ब्राह्मभक्त- महाराज, बिना सब त्याग किए क्या ईश्वर नहीं मिलते ?
श्रीरामकृष्ण(सहास्य)- नहीं जी, तुम लोगों को सब कुछ क्यों त्याग करना होगा? तुम लोग तो बड़े अच्छे हो, इधर भी हो और उधर भी, आधा खाँड़ और आधा शीरा !(लोग हँसते हैं) बड़े आनन्द में हो । नक्स का खेल जानते हो? मैं ज्यादा काटकर जल गया हूँ । तुम लोग बड़े सयाने हो, कोई दस में हो, कोई छः में, कोई पाँच में । मैं ज्यादा नहीं काटा इसलिए मेरी तरह जल नहीं गए । खेल चल रहा है । यह तो अच्छा है । (सब हँसे)
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“सच कहता हूँ, तुम लोग गृहस्थी में हो, इसमें कोई दोष नहीं । पर मन ईश्वर की ओर रखना चाहिए । नहीं तो न होगा । एक हाथ से काम करो और एक हाथ से ईश्वर को पकड़े रहो । काम खतम हो जाने पर दोनों हाथों से ईश्वर को पकड़ लेना ।”
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“सब कुछ मन पर निर्भर है । मन ही से बद्ध है और मनही से मुक्त । मन पर जो रंग चढ़ाओगे उसी से वह रँग जायगा । जैसे रँगरेज के घर के कपड़े, लाल रंग से रँगो तो लाल; हरे से रँगो तो हरे; सब्ज से रँगो, सब्ज; जिस रंग से रँगो वही रंग चढ़ जायगा । देखो न, अगर कुछ अंग्रेजी पढ़ लो तो मुँह में अंग्रेजी शब्द आ जाते हैं-फुट्-फट् इट्-मिट् । (सब हँसे) और पैरों में बूट-जूता, सीटी बजाकर गाना-ये सब आ जाते हैं । और पण्डित संस्कृत पढ़े तो श्लोक आवृत्ति करने लगता है । मन के यदि कुसंग में रखो तो वैसी ही बातचीत, वैसी ही चिन्ता हो जाएगी । यदि भक्तों के साथ रखो तो ईश्वर चिन्तन, भगवतप्रसंग-ये सब होंगे ।”
“मन ही को लेकर सब कुछ है । एक ओर स्त्री है और एक ओर सन्तान । स्त्री को एक भाव से और सन्तान को दूसरे भाव से प्यार करता है, किन्तु है एक ही मन ।”
(क्रमशः)

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