मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*

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*परम कथा उस एक की, दूजा नांही आन ।*
*दादू तन मन लाइ कर, सदा सुरति रस पान ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*
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यस्‍मै दातुं चोरयन् क्षीरभाण्‍डं
गोपीनाथ: क्षीरचोराभिधोऽभूत्।
श्रीगोपाल: प्रादुरासीद् वश: सन्
यत्‍प्रेम्‍णा तं माधवेन्‍द्रं नतोऽस्मि॥[१]
([१] जिन्‍हें चोरी से क्षीर का पात्र देने से साक्षात गोपीनाथ भगवान क्षीरचोर कहलाये, जिनके प्रेम के प्रभाव से साक्षात श्रीगोपाल जी प्रकट हुए, उन महामान्‍य श्रीमन्‍माधवेन्‍द्रपुरीजी के चरणों में हम प्रणाम करते हैं। चै. च. म. ली. 4/1)
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भक्तों के सहित आनन्‍द-विहार करते-करते जलेश्‍वर, ब्रह्मकुण्‍ड, मन्‍दार आदि तीर्थो में दर्शन-स्‍नान करते हुए महाप्रभु रेमुणाय नामक तीर्थ में पहुँचे। वहाँ जाकर क्षीरचोर गोपीनाथ भगवान के मन्दिर में जाकर प्रभु ने भगवान के दर्शन किये। प्रभु आनन्‍द में विभोर होकर गोपीनाथ भगवान की बड़े ही करुण-स्‍वर में स्‍तुति करने लगे। स्‍तुति करते-करते वे प्रेम में बेसुध हो गये।
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अन्‍त में उन्‍होंने भगवान के चरण-कमलों में साष्‍टांग प्रणाम किया। उसी समय भगवान् के शरीर से एक पुष्‍पों का बड़ा भारी गुच्‍छा निकलकर ठीक प्रभु के मस्‍तक के ऊपर गिर पड़ा। सभी दर्शनार्थी तथा पुजारी प्रभु के ऐसे भक्तिभाव को देखकर अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हुए और महाप्रभु के प्रेम की सराहना करने लगे। प्रभु ने उस पुष्‍प-गुच्‍छ को भगवान की प्रसादी समझकर भक्ति-भाव से सिर पर धारण कर लिया और बहुत देर तक भक्तों के सहित मन्दिर में संकीर्तन करते रहे। अन्‍त में वहीं पर रात्रि में विश्राम भी किया।
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नित्‍यानन्‍द जी ने पूछा- ‘प्रभो ! इन श्रीगोपीनाथ भगवान का नाम ‘क्षीरचोर’ क्‍यों पड़ा है?’ प्रभु ने हँसकर उतर दिया- ‘आपसे क्‍या छिपा होगा? गोपीनाथ भगवान को क्षीरचोर बनाने वाले आपके पूज्‍यपाद गुरुदेव और मेरे गुरु के भी गुरु श्री मन्‍माधवेन्‍द्रपुरी जी महाराज ही हैं। उनके मुख से आपने ‘क्षीरचोर’ भगवान की कथा अवश्‍य ही सुनी होगी।
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किन्‍तु फिर भी आप अन्‍य भक्तों के कल्‍याण के निमित्त मेरे मुख से इस कथा को सुनना चाहते हैं तो जिस प्रकार मैंने अपने पूज्‍यपाद गुरुदेव श्रीईश्‍वरीपुरी के मुख से सुनी है, उसे आपको सुनाता हूँ। ऐसी कथाओं को तो बार-बार सुनना चाहिये। इन कथाओं के श्रवण से भगवान के पादपद्मों में प्रीति उत्‍पन्‍न होती है और भगवान की भक्तवत्‍सलता के विषय में दृढ़ भावना होती है कि वे अपने भक्तों की इच्‍छा-पूर्ति के निमित्त सब कुछ कर सकते हैं।
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ऐसी कथाओं के सम्‍बन्‍ध में यह कभी भी न कहना चाहिये कि यह तो हमारी सुनी हुई है, इसे फिर क्‍या सुनें। जैसे एक दिन भरपेट भोजन कर लेने पर दूसरे दिन फिर उसी प्रकार के भोजन करने की इच्‍छा होती है, इसी प्रकार भक्तों को भगवान के सम्‍बन्‍ध की कथाएं सुनने में कभी उपेक्षा न करनी चाहिये, वे जितनी भी बार सुनने को मिल सकें, सुननी चाहिये। भक्त और भगवत-सम्‍बन्‍धी कथाओं के सम्‍बन्‍ध में सदा अतृप्‍त ही बने रहना चाहिये।
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अच्‍छा, तो मैं क्षीरचोर श्रीगोपीनाथ के उस पुण्‍य आख्‍यान को आप लोगों के सामने कहता हूँ, आप सभी लोग ध्‍यानपूर्वक सुनें।’ प्रभु की ऐसी बात सुनकर सभी भक्‍त उत्‍सुकतापूर्वक प्रभु के मुख की ओर देखने लगे। और भी दस-बीस भद्र पुरुष वहाँ आ गये थे, वे भी प्रभु के मुख से क्षीरचोर भगवान की कथा सुनने के निमित बैठ गये।
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सबको उत्‍साहपूर्वक अपनी ओर टकटकी लगाये देखकर प्रभु बड़े ही मधुर स्‍वर से कहने लगे- मेरे गुरु के भी गुरु वैकुण्‍ठवासी भगवान माधवेन्‍द्रपुरी की कृष्‍ण-भक्ति अलौकिक थी वे अहर्निश श्रीकृष्‍ण-कीर्तन में ही लगे रहते थे, सोते-जागते वे सदा श्रीहरि के ही रुप का चिन्‍तन करते रहते।
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उनकी जिह्वा को भगवन्‍नाम का ऐसा चश्‍का लग गया था कि वह कभी ख़ाली नहीं रहती, सदा उन जगत्‍पति के मंगलमय मंजुल नामों का ही बखान करती रहती। उनकी इस उत्‍कट भक्ति के ही कारण भगवान को खीर की चोरी करने पड़ी। भगवान माधवेन्‍द्रपुरी एक बार व्रज की यात्रा करते-करते गिरिराज गोवर्धन पर्वत के समीप पहुँचे।
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वहाँ पर गिरि-कानन की कमनीय छटा को देखकर वे मन्‍त्रमुग्‍ध-से बन गये और वहीं गिरिवर के समीप विचरण करने लगे। एक दिन उन्‍होंने गोवर्धन के निकट जंगल में एक वृक्ष के नीचे निवास किया। पुरी महाराज की अयाचित वृत्ति थी। वे भोजन के लिये भी किसी से याचना नहीं करते थे। प्रारब्‍धवशात जो भी कुछ मिल जाता उसे ही सन्‍तोषपूर्वक पाकर कालयापन करते थे।
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उस दिन उन्‍हें दिन भर कुछ भी आहार नहीं मिला। शाम के समय वे उसी वृक्ष के नीचे बैठे भगवन्‍नामों का उच्‍चारण कर रहे थे कि उन्‍हें किसी के पैरों की आवाज सुनायी दी। वे चौंककर पीछे की ओर देखने लगे। उन्‍होंने क्‍या देखा कि एक काले रंग का ग्‍यारह-बारह वर्ष की अवस्‍था वाला बालक हाथ में दूध का पात्र लिये उनकी ओर आ रहा है।
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शरीर का रंग काला होने पर भी बालक के चेहरे पर एक अदभुत तेज प्रकाशित हो रहा था, उसके सभी अंग सुडौल-सुन्‍दर और चित्ताकर्षक थे। उसने बड़े ही कोमल स्‍वर में कुछ हंसते हुए कहा-‘महात्‍मा जी ! भूखे क्‍यों बैठे हो ? लो इस दूध को पीलो।’ पुरी ने पूछा- ‘तुम कौन हो और तुम्‍हें इस बात का कैसे पता चला कि मैं यहाँ जंगल में बैठा हूँ?’
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बालक ने हंसते हुए कहा- ‘मैं जाति का ग्‍वाला हूँ, मेरा घर इसी झाड़ी के समीप के ग्राम में है। मेरी माता अभी जल भरने यहाँ आयी थी, उसी ने आपको यहाँ बैठे देखा था और घर जाकर उसी ने मुझसे दूध दे आने को कह दिया था। इसीलिये मैं जल्‍दी से गौ को दुहकर आपके लिये दूध ले आया हूँ।
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हमारे यहाँ का यह नियम है कि हमारे यहाँ का यह नियम है कि हमारे ग्राम के समीप कोई भुखा नहीं सोने पाता। जो मांगकर खाते हैं, उन्‍हें हम रोटी दे देते हैं और जिनका अयाचित व्रत हैं, उन्‍हें उनकी इच्‍छा के अनुसार दूध-फल अथवा अन्‍न के बने पदार्थ दे जाते हैं। आप इस दूध को पी लें, मैं फिर आकर इस पात्र को ले आऊँगा।’ इतना कहकर वह बालक चला गया।
(क्रमशः)

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