मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

*९०. महाप्रभु का प्रेमोन्‍माद और नित्‍यानन्‍दजी द्वारा दण्‍ड–भंग*


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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*ज्यों घट आत्म एक है, ऐसे होंहि असंख ।*
*भर भर राखै रामरस, दादू एकै अंक ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९०. महाप्रभु का प्रेमोन्माद और नित्यानन्दजी द्वारा दण्ड–भंग*
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प्रभु दौड़ मारकर आगे चलने लगे और दौड़ते-दौड़ते जलेश्वर नामक स्थान में पहुँचे। वहाँ जलेश्वर नामक शिव जी का एक बड़ा भारी मन्दिर है, उस समय बहुत-से वेदज्ञ श्रद्धालु ब्राह्मण उस मन्दिर में धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन की सामग्रियों से शिव जी की स्तुति ही कर रहा था।
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भाँति-भाँति के बाजे बज रहे थे। प्रभु उस पूजन-कृत्य को देखकर बड़े ही संतुष्ट हुए। दण्ड-भंग कर देने के कारण नित्यानन्द जी के प्रति थोड़ा-सा क्रोध किया था, वह शिव जी के दर्शन मात्र से ही जाता रहा। वे आनन्द में निमग्न होकर जोर से शिव जी का कीर्तन करने लगे।
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भावावेश में आकर वे- ‘शिव-शिव शम्भो, हर-हर महादेव, इस पद को गा-गाकर नाचने-कूदने लगे। इनके नृत्य को देखकर सभी दर्शक आश्चर्य के सहित इन्हें चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये। उस समय सभी को इस बात का भान हुआ कि मानो साक्षात भोले बाबा ही सन्यासी वेश से ताण्डव-नृत्य कर रहे हैं।
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प्रभु के दोनों हाथ ऊपर उठे हुए थे, वे मस्त होकर पागल की भाँति प्रेमोन्माद में जोरों से उछल-उछलकर नाच रहे थे। उनके सम्पूर्ण शरीर से पसीनों की धाराएँ बह रही थी। नेत्रों में से श्रावण-भादों की तरह अश्रुओं की वर्षा हो रही थी। वे शरीर की सुध भुलाकर यन्त्र की भाँति घूम रहे थे।
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उसी समय पीछे से नित्यानन्द जी आदि भक्‍त भी मन्दिर में आ पहुँचे और प्रभु को नृत्‍य करते देखकर वे भी प्रभु के ताल-स्‍वर मिलाकर नाचने-गाने लगे। इससे प्रभु का आनन्‍द और भी कई गुना अधिक हो गया, उनके सुख की सीमा नहीं रही। सभी दर्शक प्रभु की ऐसी अपूर्व अवस्‍था देखकर अवाक रह गये।
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इस प्रकार संकीर्तन कर लेने के अनन्‍तर प्रभु ने प्रेमपूर्वक नित्‍यानन्‍द जी का आलिंगन किया और उन पर स्‍नेह प्रदर्शित करते हुए कहने लगे- ‘श्रीपाद ! आप तो मेरे अभिन्‍न-हृदय हैं। आप जो भी करेंगे, मेरे कल्‍याण के ही निमित करेंगे।
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मैंने उस समय भावावेश में आकर जो कुछ कह दिया हो, उसका आप बुरा न मानें। संसार में आपसे बढ़कर मेरा प्रिय और हो ही कौन सकता है- आप मेरे गुरु, माता, पिता और सखा हैं। जो आपका प्रिय है वही मेरा प्रिय है। आप मेरी बातों को कुछ बुरा न मानें।’
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प्रभु के मुख से अपने लिये ऐसे स्‍तुति-वाक्‍य सुनकर नित्‍यानन्‍द जी से कुछ लज्जित-से हुए और संकोच के स्‍वर में कहने लगे- ‘प्रभो ! आप सर्व-समर्थ हैं, जिसे जो चाहें सो कहें, जिसे जितना ऊँचा चढ़ाना चाहें चढ़ा दें। आप तो अपने सेवकों को सदा से ही अपने से अधिक सम्‍मान प्रदान करते रहे हैं।
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यह तो आपकी सनातन रीति है, इस प्रकार प्रेम की बातें होने पर सभी ने विश्राम किया और उस रात्रि में वहीं निवास किया। प्रात: काल नित्‍यकर्म से निवृत होकर प्रभु आगे चलने लगे। मत्त गजेन्‍द्र की भाँति प्रेम-वारुणी के मद में चूर हुए नाचते, कूदते और भक्तों के साथ कुतूहल करते हुए प्रभु आगे चले जा रहे थे, कि इतने में ही इन्‍हें एक वाममार्गी शाक्त पन्‍थी साधु मिला।
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प्रभु की ऐसी प्रेम की उच्‍चावस्‍था देखकर उसने समझा ये भी कोई वाममार्गी साधु हैं, अत: प्रभु से वाममार्गी पद्धति से प्रणाम करके कहने लगा- ‘कहो, किधर-किधर से आ रहे हो? आज तो बहुत दिन में दर्शन हुए?’
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प्रभु ने विनोद के साथ कहा- ‘इधर से ही चले आ रहे हैं, आपका आना किधर से हुआ? कुछ हाल-चाल तो सुनाओ। भैरवी चक्र में खूब आनन्‍द उड़ाता है न ?’ प्रभु की बातें सुनकर और ‘भैरवी चक्र’ तथा ‘आनन्‍द’ आदि वाममार्गियों के सांकेतिक शब्‍दों को सुनकर वह सब स्‍थानों के शाक्तों का सम्‍पूर्ण वृतान्‍त सुनाने लगा।
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प्रभु उसकी बातों को सुनते जाते थे और साथियों की ओर देखकर हंसते जाते थे। अन्‍त में उसने कहा- ‘चलिये, आज हमारे मठ पर ही निवास कीजिये। वह सब मिलकर खूब ‘आनन्‍द’ उड़ावेंगे।’ प्रभु हँसते हुए नित्‍यानन्‍द जी से कहने लगे- ‘श्रीपाद ! ‘आनन्‍द’ उड़ाने की इच्‍छा है? ये महात्‍मा तो शान्तिपुर के रास्‍ते में जैसे आनन्‍दी संन्‍यासी मिले थे, उसी प्रकार के जन्‍तु हैं। आपके पास आनन्‍द की कमी हो तो कहिये।’
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नित्‍यानन्‍द जी ने प्रभु की बात का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वे जोरों से हंसने लगे तब उस वाममार्गी साधु ने कहा- ‘नहीं आप लोग कुछ और न समझें। मेरे मठ में ‘आनन्‍द’ की कुछ कमी नहीं है। आप लोग जितना भी उड़ाना चाहे उड़ावें। चलिये, आप लोग आज मेरे मठ को ही कृतार्थ कीजिये।’
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प्रभु ने हँसते हुए कहा- ‘हाँ-हाँ, ठीक तो हैं, आप आगे चलकर सब ठीक-ठाक करें, हम पीछे से आते हैं। यह सुनकर वह साधु अगे को चला गया। प्रभु की प्रेममयी अवस्‍था देखकर उसने समझा, ये भी कोई हमारी तरह संसारी नशीली चीजों का सेवन करके पागल बनने वाले साधु होंगे। उसे पता नहीं था कि इन्‍होंने ऐसे प्‍याले का पी लिया, जिसे पीकर फिर दूसरे अम्‍ल की जरुरत ही नही पड़ती।
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उसी के नशे में सदा झूमते रहते हैं। कबीरदास जी ने इसी प्‍याले को तो लक्ष्‍य करके कहा है-
कबीर प्‍याला प्रेम का अन्‍तर लिया लगाय।
रोम-रोम में रमि रहा, और अमल का खाय॥
धन्‍य है, ऐसे अ‍मलियों को। ऐसे नशेखोरों के सामने ये संसारी सभी नशे तुच्‍छ और हेय हैं। इस प्रकार अपने सभी साथियों को आनन्दित और सुखी बनाते हुए प्रभु पुरी के पथ को तै करने लगे।
(क्रमशः)

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