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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*दादू माया आगे जीव सब, ठाढे रहे कर जोड़ ।*
*जिन सिरजे जल बूँद सौं, तासौं बैठे तोड़ ॥९४॥*
संसारी पुरुष माया के आगे हाथ जोड़कर उसकी प्राप्ति के लिये स्तुति करते हैं । किन्तु जिस परमात्मा ने करुणा करके यह शरीर दिया उस दया सागर परमात्मा को माया के कृपापात्र भूल गये । यह जीव के लिये उचित नहीं है । केवल यह माया के प्रभाव का उत्कर्ष है ।
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*सुर नर मुनिवर वश किये, ब्रह्मा विष्णु महेश ।*
*सकल लोक के सिर खड़ी, साधु के पग हेठ ॥९५॥*
देवता मनुष्य तथा मुनियों में श्रेष्ठ मुनि भी माया के वशीभूत होकर उसी की ही स्तुति करते हैं । अधिक क्या कहें, ब्रह्मा विष्णु महेश भी उसके वशीभूत होकर उसकी आज्ञा का पालन करते हैं । किन्तु जो भगवान् के भक्त हैं उनके चरणों की सेवा तो माया खुद करती है । अतः माया पर विजय पाने के लिये भगवान् का ही आश्रय लेना चाहिये ।
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*दादू माया चेरी संत की, दासी उस दरबार ।*
*ठकुराणी सब जगत की, तीनों लोक मंझार ॥९६॥*
*दादू माया दासी संत की, शाकत की सिरताज ।*
*शाकत सेती भांडणी, संतों सेती लाज ॥९७॥*
यह माया सन्तों की तो दासी है और उन भक्तों की तो श्रद्धा से सेवा करती है और जो अभक्त हैं उनकी की तो यह स्वामिनी है । अतः वे ही माया की सेवा करते हैं । उनको निर्लज्ज माया जन्म जन्मान्तरों में घूमाती रहती है । सज्जनों के तो सामने जाती हुई लज्जा करती है ।
(क्रमशः)

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