शुक्रवार, 1 मई 2020

*४. विरह कौ अंग ~ १५७/१६०*

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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ १५७/१६०*
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मरि करि पाई बंदगी, महरवान की महरि ।
कहि जगजीवन बिराजै, सुखनदान इह सहर२ ॥१५७॥
{२. सहर-शहर(=नगर)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अहम् छोड़कर ही उस मालिक की दया मिलती है । फिर वह सुख के दाता स्वयं साथ ही काया नगरी में विराजते हैं।
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मरि करि पाई बंदगी, षलवति३ फिराक रज ।
कहि जगजीवन नूर मंहि, नूर पिछांणै गंज४ ॥१५८॥
(३. षलवति-खिलवत= निर्जन स्थान) 
(४. गंज-व्यापारियों का समूह)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अहम् छोडकर ही प्रार्थना होती है एकान्त में खिली हुए पुष्प की गंध या निर्जन में पड़ी धूल में सने हीरे को जौहरी पहचान जाता है वैसे ही बिना आडम्बर के किये प्रयास को वह परमात्मा पहचान जाता है।
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बिरह पठाया रांमजी, सिर चढ़ाइ सो लीन ।
कहि जगजीवन आप घर, सब कारज तिहिं कीन ॥१५९॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि राम जीने जीव के उद्धार के लिये विरह को भेजा है जो इसे सम्मान सहित हितकारी समझ कर प्रभु विरह में लीन रहते हैं परमात्मा उनके सब कार्य अपने घर से करते हैं ।
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बिरहनि रूप उतपति सकल, वो ऊँकार सत आदि ।
कहि जगजीवन देखि जन, नीर पीया तज गादि५ ॥१६०॥
{५. गादि-तलछट (=नीचे इकट्ठा हुआ मलिन पदार्थ)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि विरही जन का सर्वस्व ओमकार है संसार की अन्य वस्तुएँ वह ऐसे त्यागता है जसे विद्वज्जन जल मिलने पर कीचड़ को देखते भी नहीं।
(क्रमशः)

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