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*साधु जन संसार में, शीतल चंदन वास ।*
*दादू केते उद्धरे, जे आये उन पास ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११४. गौर भक्तों का पुरी में अपूर्व सम्मिलन*
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वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नम:॥[१]
([१] कामनाओं के कल्पवृक्ष, करुणा के सागर और पतितों के पवित्र करने वाले विष्णुभक्तों को नमस्कार है। चैत. म. भा.)
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अहा ! कितना सुखद संवाद है, हृदय को प्रफुल्लित कर देने वाला यह कैसा मनोहारी वृत्तान्त है। आपने प्रिय के सम्मिलन-सुख को सुनकर ऐसा कौन हृदयहीन जड बुद्धि पुरुष होगा, जिसका मन कमल लिख न उठता हो। नीतिकारों ने ठीक ही कहा है- ‘अमृतं प्रियदर्शनम्।’
इस संसार में अपने प्यारे से भेंट होना ही सर्वोत्तम अमृत है। जो इस अमृत का निरन्तर पान करते रहते हैं, ऐसे भक्तों के चरणों में हमारा बारम्बार प्रणाम है।
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महाप्रभु के पुरी पधारने का समाचार सुनते ही गौर-भक्तों के आनन्द की सीमा नहीं रही। बहुत से भक्त तो प्रभु के साथ संकीर्तन सुख का आनन्द अनुभव कर चुके थे। बहुत से ऐसे भी थे, जिन्होंने अभी तक महाप्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन ही नहीं किये थे। उन्होंने प्रभु के बिना दर्शन किये ही उन्हें आत्मसमर्पण कर दिया था।
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आज उनके आनन्द का कहना ही क्या है, सभी भक्त प्रभु के दर्शन की खुशी में अपने आप को भूले हुए हैं। सभी ने पुरी में चलकर प्रभु के दर्शनों का निश्चय किया। सभी भक्तों के अग्रणी आचार्य अद्वैत ही थे। उनकी सम्मति हुई कि हम लोगों को पुरी के लिये शीघ्र ही प्रस्थान कर देना चाहिये, जिससे आषाढ़ में होने वाली भगवान की रथयात्रा में भी सम्मिलित हो सकें और बरसात के चार महीने प्रभु के समीप ही बितावें।
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यह सम्मति सबको पसंद आयी, सभी अपने अपने घरों का चार महीने का प्रबन्ध करके पुरी जाने के लिये तैयार हो गये। श्रीवास आदि सभी भक्तों ने शचीमाता से प्रभु के समीप जाने के लिये विदा मांगी। वात्सल्यमयी जननी ने अपने संन्यासी पुत्र के लिये भाँति-भाँति की वस्तुएँ भेजीं।
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भक्तों ने उन सभी वस्तुओं को सावधानीपूर्वक अपने साथ रख लिया और वे माता की चरण-वन्दना करके पुरी के लिये चल दिये। लगभग २०० भक्त गौरगुण गाते हुए और ढोल करताल के साथ संकीर्तन करते हुए पैदल ही चले। आगे आगे वृद्ध अद्वैताचार्य युवा पुरुष की भाँति प्रभु के दर्शन की उत्सुकता के कारण जल्दी जल्दी चल रहे थे, उनके पीछे सभी भक्त नवीन उत्साह के साथ-
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हरिहरये नम: कृष्णयादवाय नम:।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन॥
-इस पद का संकीर्तन करते हुए चल रहे थे। इस प्रकार चलते चलते २० दिन में वे पुरी के निकट पहुँच गये।
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इधर भगवान की स्नान-यात्रा का समय समीप आ पहुँचा। महाप्रभु बड़ी ही उत्सुकता से स्नान यात्रा की प्रतीक्षा करने लगे। स्नान यात्रा के दिन महाप्रभु अपने भक्तों सहित मन्दिर में दर्शन करने के लिये गये। उस दिन के उनके आनन्द का वर्णन कौन कर सकता है।
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महाप्रभु प्रेम में बेसुध होकर उन्मत्त पुरुष की भाँति मन्दिर में ही कीर्तन करने लगे। लोगों की अपार भीड़ महाप्रभु के चारों ओर एकत्रित हो गयी। जैसे तैसे भक्त उन्हें स्थान पर लाये। स्नान यात्रा के अनन्तर १४ दिन तक भगवान अन्त:पुर में रहते हैं, इसलिये १४ दिनों तक मन्दिर के फाटक एकदम बंद रहते हैं, किसी को भी भगवान के दर्शन नहीं हो सकते।
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महाप्रभु के लिये यह बात असह्य थी, वे भगवान के दर्शन के लोभ से ही तो पुरी में निवास करते हैं, जब भगवान के दर्शन ही न होंगे, तो वे फिर पुरी में किसके आश्रय से ठहर सकते हैं। फाटक बन्द होते ही महाप्रभु की वियोग-वेदना बढ़ने लगी और वह इतनी बढ़ी कि फिर उनके लिये पुरी में रहना असह्य हो गया, वे गोपियों की भाँति विरह के भावावेश में पुरी को छोड़कर अकेले ही अलालनाथ चले गये।
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वे अपने प्यारे के दर्शन न पाने से इतने दु:खी हुए कि उन्होंने भक्तों की अनुनय विनय की कुछ भी परवाह न की। प्रभु के पुरी परित्याग के कारण सभी भक्तों को अपार दु:ख हुआ। महाराज प्रतापरुद्र जी ने भी प्रभु के अलालनाथ चले जाने का समाचार सुना। उन्होंने भट्टाचार्य सार्वभौम से प्रभु को लौटा लाने के लिये भी कहा।
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उसी समय गौड़ीय भक्तों के आगमन का समाचार सुना। इस संवाद को सुनकर सभी को बड़ी भारी प्रसन्नता हुई। सार्वभौम भट्टाचार्य नित्यानन्द जी आदि भक्तों को साथ लेकर प्रभु को लौटा लाने के लिये अलालनाथ गये। वहाँ जाकर इन लोगों ने प्रभु से प्रार्थना की कि पुरी के भक्त तो आपके दर्शन के लिये व्याकुल हैं ही, गौड़-देश से भी बहुत से भक्त केवल प्रभु के दर्शन के निमित्त आये हैं।
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यदि वे प्रभु के पुरी में दर्शन न पावेंगे, तो उन्हें अपार दु:ख होगा; इसलिये भक्तों के ऊपर कृपा करके आप पुरी लौट चलें। प्रभु ने भक्तों की विनय को स्वीकार कर लिया। गौड़ीय भक्तों के आगमन संवाद से उन्हें अत्यधिक प्रसन्नता हुई और वे उसी समय भक्तों के साथ पुरी लौट आये।
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'महाप्रभु पुरी लौट आये हैं’ इस संवाद को सुनाने के निमित्त सार्वभौम भट्टाचार्य महाराज प्रतापरुद्रदेव जी के समीप गये। उसी समय पुरुषोत्तमचार्य जी महाराज के समीप पहुँच गये। आचार्य ने कहा- ‘महाराज ! गौड़ देश के लगभग २०० गौर-भक्त पुरी आये हुए हैं। उनके ठहरने की और महाप्रसाद की व्यवस्था करनी चाहिये क्योंकि वे सब के सब महाप्रभु के चरणों में अत्यधिक अनुराग रखते हैं और इसीलिये वे आये हैं।’
(क्रमशः)

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