शनिवार, 2 मई 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग भाँणमली(भवानी) १४, (गायन समय मध्य रात्रि, राम मँजरी मतानुसार)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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२६१ - (गुजराती) जलद त्रिताल
चरण देखाड़ तो परमाण१ ।
स्वामी माहरै नैचरणों निरखूँ, मांगँ येज२ मान३ ॥टेक॥
जोवूँ तुझनें आशा मुझनें, लागूँ येज ध्यान ।
वाहलो मारो मलो रे सहिये४, आये केवल ज्ञान ॥१॥
जेणी पेरें५ हूं देखूँ तुझनें, मुझनें आलो६ जाण ।
पीव तणी हूं पर नहिं जाणूं, दादू रे अजाण ॥२॥
हे प्रभो ! आप मुझे अपने चरणों का दर्शन दो, तब ही आपकी भक्त वत्सलता सत्य१ सिद्ध होगी । स्वामिन् ! मैं मेरे नेत्रों से आपका दर्शन कर सकूं, यही२ आप से मांगता हूं । मेरी प्रार्थना मानो३ । 
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मुझे यही आशा लगी है - मैं आपको देखूँ ! इसीलिए आपका यह ध्यान करता हूँ । यदि बुद्धि में अद्वैत ज्ञान आ जाय, तब तो मेरा प्रियतम मिला हुआ ही है । यह निश्चय४ कर लूं । 
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हे प्रभो ! जिस तरह५ मैं आपको देख सकूं, वैसा ही अपना प्रिय६ भक्त मुझे जान लो । मैं हूँ तो प्रियतम का ही, किन्तु प्रियतम का पूर्ण स्वरुप नहीं जानता, इसलिए अजान ही हूँ ।
(क्रमशः)

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