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*भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने कोइ ।*
*दादू भक्ति भगवंत की, देह निरन्तर होइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(७)
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्त हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ।। (गीता, १२/५)
*भक्तियोग ही युगधर्म है । ज्ञानयोग की विशेष कठिनता*
* ‘दास में’ – ‘भक्त मैं’ और ‘बालक मैं’*
विजय- महाराज, आप ‘बदमाश मैं’ को दूर करने के लिए कहते हैं, तो क्या ‘दास मैं’ में दोष नहीं?
श्रीरामकृष्ण- नहीं । ‘दास मैं’ अर्थात् ‘मैं ईश्वर का दास हूँ’, ‘मैं उनका भक्त हूँ’ इस अभिमान में दोष नहीं, बल्कि इससे भगवान् मिलते हैं ।
विजय- अच्छा, तो ‘दास मैं’ वाले के काम-क्रोधादि कैसे होते हैं?
श्रीरामकृष्ण- अगर उसके भाव में पूरी सचाई आ जाय तो काम-क्रोधादि का आकर मात्र रह जाता है । यदि ईश्वरलाभ के बाद भी किसी का ‘दास मैं’ या ‘भक्त मैं’ बना रहा तो वह मनुष्य किसी का अनिष्ट नहीं कर सकता । पारस पत्थर छू जाने पर तलवार सोना हो जाती है; तलवार का स्वरूप तो रहता है, पर वह किसी की हिंसा नहीं करती ।
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“नारियल के पेड़ का पत्ता झड़ जाता है, उसकी जगह सिर्फ दाग बना रहता है, जिससे यह समझ लिया जाता है कि कभी यहाँ पत्ता लगा हुआ था । इसी तरह जिसको ईश्वर मिल गये हैं उसके अहंकार का चिन्ह भर रह जाता है, काम-क्रोध का स्वरूप मात्र रह जाता है, उसकी बालक जैसी अवस्था हो जाती है । बालक सत्त्व, रज, तम में से किसी गुण के बन्धन में नहीं आता । बालक जितनी जल्दी किसी वस्तु पर अड़ जाता है, उतनी जल्दी वह उसे छोड़ भी देता है ।
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एक पाँच रुपये की कीमत का कपड़ा चाहे तुम धेले के खिलौने पर रिझाकर फुसला लो । पहले तो वह बहककर कहेगा, ‘नहीं, मैं न दूंगा, मेरे बाबूजी ने मोल ले दिया है ।’ और लड़के के लिए सभी बराबर हैं । ये बड़े हैं, यह छोटा है, यह ज्ञान उसे नहीं; इसीलिए उसे जाति-पाँति का विचार भी नहीं है । माँ ने कह दिया है, ‘वह तेरा दादा है’, फिर चाहे वह कलार हो, वह उसी के साथ बैठकर रोटी खाता है । बालक को घृणा नहीं, शुचि और अशुचि पर ध्यान नहीं, शौच के लिए जाकर हाथ नहीं मटियाता ।
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“कोई कोई समाधि के बाद भी ‘भक्त का मैं’, ‘दास का मैं’ लेकर रहते हैं । ‘मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो’, ‘मैं भक्त हूँ, तुम भगवान् हो ।’ यह अभिमान भक्तों का बना रहता है । ईश्वरलाभ के बाद भी रहता है । सम्पूर्ण ‘मैं’ नहीं दूर होता । और फिर इसी अभिमान का अभ्यास करते करते ईश्वर-प्राप्ति भी होती है । यही भक्तियोग है ।
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‘भक्ति के मार्ग पर चलने से भी ब्रह्मज्ञान होता है । भगवान् सर्वशक्तिमान हैं । वे इच्छा करें तो ब्रह्मज्ञान भी दे सकते हैं । भक्त प्रायः ब्रह्मज्ञान नहीं चाहते । ‘मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो’, ‘मैं बच्चा हूँ, तू माँ हैं’ वे ऐसा अभिमान रखना चाहते हैं ।
विजय- जो लोग वेदान्त-विचार करते हैं, वे भी तो उन्हें पाते हैं?
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श्रीरामकृष्ण- हाँ, विचारमार्ग से भी वे मिलते हैं । इसी को ज्ञानयोग कहते हैं । विचारमार्ग बड़ा कठिन है । सप्तभूमि की बात तो तुम्हें बतलायी है । सप्तम भूमि पर मन के पहुँचने से समाधि होती है, ‘ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या’ यह बोध होने पर मन का लय होता है, समाधि होती है । परन्तु कलि में जीवों का प्राण अन्न्गत है ‘ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या’ का बोध फिर कैसे हो सकता है?’ ऐसा बोध देहबुद्धि के बिना दूर हुए नहीं हो सकता । ‘मैं न शरीर हूँ, न मन हूँ, न चौबीस तत्त्व हूँ, मैं सुख और दुःख से परे हूँ, मुझे फिर किसा रोग, कैसा शोक, कैसी जरा, कैसी मृत्यु?’ –ऐसा बोध कलिकाल में होना कठिन है । चाहे जितना विचार करो, देहात्मबुद्धि कहीं न कहीं से आ ही जाती है । बड़ के पेड़ को काट डालो, तुम तो सोचते हो कि जड़ समेत उखाड़ फेंका, पर दूसरे दिन सबेरे उसमें कनखा निकला ही हुआ देखोगे ! देहाभिमान नहीं दूर होता; इसीलिए कलिकाल में भक्तियोग अच्छा है, सीधा है ।
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“और ‘मैं चीनी बन जाना नहीं चाहता, चीनी खाना ही मुझे अच्छा जान पड़ता है ।’ मेरी कभी यह इच्छा नहीं होती कि कहूँ ‘मैं ही ब्रह्म हूँ ।’ मैं तो कहता हूँ ‘तुम भगवान् हो, मैं तुम्हारा दास हूँ ।’ पाँचवीं और छठी भूमि के बीच में चक्कर काटना अच्छा है । छठी भूमि को पार कर सप्तम भूमि में अधिक देर तक रहने की मेरी इच्छा नहीं होती । मैं उनका नामगुण-कीर्तन करूँगा, यही मेरी इच्छा है । सेव्य-सेवक भाव बड़ा अच्छा है । और देखो, ये तरंगें गंगा ही की हैं, परन्तु तरंगों की गंगा है ऐसा कोई नहीं कहता । ‘मैं वही हूँ’ यह अभिमान अच्छा नहीं । देहात्मबुद्धि के रहते ऐसा अभिमान जिसको होता है उसकी बड़ी हानि होती है, फिर वह आगे बढ़ नहीं सकता, धीरे धीरे पतित हो जाता है । वह दूसरों की आँखों में धूल झोंकता है, साथ ही अपनी आँखों में भी; अपनी स्थिति का हाल वह नहीं समझ पाता ।
(क्रमशः)

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