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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*॥ पुरुष प्रकाशी ॥*
*दादू जिस घट दीपक राम का, तिस घट तिमिर न होइ ।*
*उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥११२॥*
जिस साधक के मन में ब्रह्म का प्रकाश पैदा हो गया उसके मन में अज्ञानरुपी अन्धकार नष्ट हो जाता है और उसकी संगति करके अन्य साधक भी ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं ।
विवेकचूड़ामणि में- जिस साधक ने वैराग्यरूपी तलवार से विषय नामक ग्राह को मार डाला वह निर्विघ्न संसार सागर से पार चला जाता है ।
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*॥ माया ॥*
*दादू जेहि घट ब्रह्म न प्रकटै, तहँ माया मंगल गाइ ।*
*दादू जागै ज्योति जब, तब माया भ्रम विलाइ ॥११३॥*
जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तभी तक माया का भ्रम प्रतीत हो रहा है । ज्ञान होने पर तो सूर्योदय की तरह सब मायाजाल नष्ट हो जाता है । विवेकचूडामणि-
जिसका अन्तःकरण शुद्ध हो गया उसको प्रसन्नता आत्मा का अनुभव, परम शान्ति, तृप्ति और हर्ष, परमात्मनिष्ठा यह सब गुण प्राप्त हो जाते हैं । जिससे साधक सदा ही परमानन्दरस का आनन्द लेता रहता है ।
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*॥ माया ॥*
*दादू दीपक देह का, माया प्रगट होइ ।*
चौरासी लख पंखिया, तहाँ परै सब कोइ ॥११५॥*
चौरासी लाख योनि के जीव स्त्री शरीर की सुन्दरता रूपी दीपक के प्रकाश में पतंगों की तरह पड़कर जल जाते हैं और अन्त में नष्ट हो जाते हैं ।
धूम को धारण करने वाली प्रज्ज्वलित अग्नि शिखा देखने में तो सुन्दर किन्तु स्पर्श करने में दुःसह चित्रण को जला डालती है उसी प्रकार केश और काजल धारण करने तथा नेत्रों को प्रिय लगने वाली नारियां जिनका स्पर्श परिणाम दुख देने वाला है, वे पुरुष को वासना की आग से जलाती रहती हैं ।
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*॥ पुरुष प्रकाशी ॥*
*दादू यहु घट दीपक साध का, ब्रह्म ज्योति प्रकाश ।*
*दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥११६॥*
जिन सन्तों ने ब्रह्म का साक्षात्कार किया है उनके शुद्ध अन्तःकरण में जो ब्रह्म ज्ञान प्रकाश हो रहा है उस प्रकाश में जिज्ञासु जाकर सत्संग से उस ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त करके कृतकृत्य हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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