शनिवार, 23 मई 2020

*४. विरह कौ अंग ~ २४५/२४८*

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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २४५/२४८*
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जगजीवन करतार का, रूप बिरह का अंग ।
आपा आनंद ऊपजै, समझि गहै सो संग ॥२४५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु का स्वरूप उनके विरह में ही है। उनके सानिध्य से आनंद मिलता है इस बात को जो जान ले वे ही उनके संग होते हैं।
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जगजीवन२ घट भीतरै, बिरह जगावै जांण ।
दरदवंद दिल ऊधड़ै, पिय सूं किया पिछांण२ ॥२४६॥
{२-२. जब भक्त भगवान् के प्रति अपने हृदय में विरह(प्राप्ति की प्रबल इच्छा) उत्पन्न कर लेता है, तब उसका हृदय स्वच्छ(निर्मल) हो जाता है और वह भगवद्दर्शन करने में समर्थ हो जाता है ॥२४६॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु अपने भक्त को जानकर ही उसमें विरह जगाते है। जब भक्त भगवान के प्रति दर्शन की प्रबल इच्छा कर ले तो वह निर्मल हृदय भगवद्धर्शन करने में समर्थ होते हैं।
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जगजीवन बिरहनि जलै, बिना काठ बिन आगि ।
सरवस सौंप्या रांम कूं, भगति करौ भ्रम त्यागि ॥२४७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरहणी प्रभु व्यथा में बिना काष्ठ व बिना अग्नि के ही विरहदग्ध होकर अपना सर्वस्व प्रभु को सौंप कहती है कि सारे भ्रम त्याग कर प्रभु भक्ति करें।
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ढूंढूं हूं लाधै नहीं३, बिरहा संगति सार ।
जगजीवन कूं ऊपजै, अनभै अगम बिचार ॥२४८॥
(३-३. ढूंढूं हूं लाधै नहीं-मैं खोजने का पूर्ण प्रयास कर रहा हूँ, परन्तु उसकी प्राप्ति नहीं हो पा रही है)
संतजगजीवन जी कहते हैं, विरहणी कहती है कि मैं ढूंढ रही हूँ पर मुझे वे जैसा विरह है वैसे मिल नहीं रहे हैं। कोइ संतो के अनुभव से व अगम विचार द्वारा ही कुछ उपाय हो सकता है प्रभु मिलने का।
(क्रमशः)

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