शनिवार, 23 मई 2020

साच का अंग १३/१९

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*॥ अदया हिंसा ॥*
*दादू दुनियां सौं दिल बांध करि, बैठे दीन गँवाइ ।*
*नेकी नाम बिसार करि, करद कमाया खाइ ॥१३॥*
*दादू गल काटैं कलमा भरैं, अया विचारा दीन ।*
*पंचों वक्त नमाज गुजारैं, साबित नहीं यकीन ॥१४॥*
*दुनियां के पीछे पड़ा, दौड़ा दौड़ा जाइ ।*
*दादू जिन पैदा किया, ता साहिब को छिटकाइ ॥१५॥*
*कुफ्र जे के मन में, मीयां मुसलमान ।*
*दादू पेया झंग में, बिसारे रहमान ॥१६॥*
*आपस को मारै नहीं, पर को मारन जाइ ।*
*दादू आपा मारे बिना, कैसे मिले खुदाइ ॥१७॥*
*दादू भीतर द्वन्दर भर रहे, तिनको मारैं नांहि ।*
*साहिब की अरवाह को, ताको मारन जांहि ॥१८॥*
*दादू मूये को क्या मारिये, मीयां मूई मार ।*
*आपस को मारै नहीं, औरों को हुसियार ॥१९॥*
इन सब ऊपर लिखे हुए पद्यों(साखियों में) हिंसक पुरुषों का व्यवहार बतला रहे हैं श्री दादूजी महाराज ।
हिंसक प्राणी सांसारिक विषयों में आसक्त हुए सत्यधर्म तथा परोपकार को छोड़ते हुए भगवान् को भी भूल जाते हैं । अपनी जीविका को चलाने के लिये दूसरे प्राणियों की हत्या करते हैं । बिना मन से भगवान् को भजते हुए अपने को शुद्ध भक्त प्रसिद्ध करने की चेष्टा करते हैं । पांच समय नमाज पढते हुए हरि की प्रार्थना करते हैं परन्तु प्रभु में जरा सा भी विश्वास नहीं होता । जन्म देने वाले परमात्मा को भुलाकर अपनी कार्य सिद्धि के लिये तुच्छ से तुच्छ मानवों का सहारा लेते हैं । बल पूर्वक प्राणियों को पकड़कर हत्या करते हैं । 
हठीनास्तिक द्वेषी होते हुए भी अपनी जाति वालों में श्रेष्ठ बनने की चेष्टा करते रहते हैं । परस्पर झगड़ा करते हैं । अपने अहंकार को जो मारने योग्य है उसको नहीं मारते और प्राणियों की हत्या करते रहते हैं । ऐसे हिंसक मानवों पर प्रभु की कृपा नहीं होती है । उनकी कृपा के बिना उनका उद्धार भी नहीं हो सकता । आश्चर्य है कि अपने मन में जो कामक्रोध आदि शत्रु रहते हैं उनको न मार कर निरपराध प्राणियों को मारते हैं । हे मुसलमानो ! जो अपने कर्म से पहले ही मरे हुए हैं अतएव मृत तुल्य उन प्राणियों को क्यों मारते हो । ये मारने के योग्य नहीं है । किन्तु तुम्हारी कृपा के पात्र हैं अतः इन सब पर दया करो । क्योंकि दया धर्म सबसे बड़ा धर्म है । 
महाभारत में- अहिंसा ही परम दान, परम तप, परम यज्ञ तथा सर्वोत्कृष्ट फल हैं । अहिंसा सब का मित्र है, परम सुख को देने वाली है । सब यज्ञों में जो दान दिया जाता है सर्व तीर्थों में स्नान से जो पुण्य प्राप्त होता है वह सब मिलकर भी अहिंसा के फल की बराबरी नहीं कर सकते । सनातन धर्म की यही शिक्षा है कि आप किसी भी प्राणी के साथ मन वाणी तथा कर्म से द्रोह मत करो । किन्तु सब पर दया करो तथा दान दो । संत तो अपने शत्रु के मिल जाने पर उस पर भी दया ही किया करते हैं । 
(क्रमशः)

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