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*दादू मैं भिखारी मंगता, दर्शन देहु दयाल ।*
*तुम दाता दुख भंजता, मेरी करहु संभाल ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११५. भक्तों के साथ महाप्रभु की भेंट*
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यस्यैव पादाम्बुजभक्तिलभ्य:
प्रेमाभिधान: परम: पुमर्थ:
तस्मै जगन्मगंलमगलाय
चैतन्यचन्द्राय नमो नमस्ते॥[१]
([१] जिनके ही चरण कमलों की भक्ति द्वारा ‘प्रेम’ नामक परम पुरुषार्थ सुलभ है उन जगत के मंगलों के भी मंगलस्वरूप श्रीचैतन्यदेव को बार बार प्रणाम है।)
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महाप्रभु अपने भक्तों से मिलने के लिये व्याकुल हो रहे थे, आज दो वर्ष के पश्चात वे अपने सभी प्राणों से भी प्यारे भक्तों से पुन: मिलेंगे, इस बात का स्मरण आते ही प्रभु प्रेम सागर मे डुबकियाँ लगाने लगते। इतने में ही उनके कानों में संकीर्तन की सुमधुर ध्वनि सुनायी पड़ी। उस नवद्वीपी ध्वनि को सुनते ही, प्रभु को श्रीवास पण्डित के घर की एक एक करके सभी बातें स्मरण होने लगीं।
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प्रभु के हृदय में उस समय भाँति-भाँति के विचार उठ रहे थे, उसी समय उन्हें सामने से आते हुए अद्वैताचार्य जी दिखायी दिये। प्रभु ने अपने परिकर के सहित आगे बढ़कर भक्तों का स्वागत किया। आचार्य ने प्रभु के चरणों में प्रणाम किया, प्रभु ने उनका गाढ़ालिंगन किया और बड़े ही प्रेम से अश्रु-विमोचन करते हुए वे आचार्य से लिपट गये।
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उस समय उन दोनों के सम्मिलन-सुख का उनके सिवा दूसरा अनुभव ही कौन कर सकता है? इसके अनन्तर श्रीवास, मुकुन्ददत्त, वासुदेव तथा अन्य सभी भक्तों ने प्रभु के चरणों में प्रणाम किया। प्रभु सभी को यथायोग्य प्रेमालिंगन प्रदान करते हुए सभी की प्रशंसा करने लगे।
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इसके अनन्तर आप वासुदेव जी से कहने लगा- ‘वसु महाशय ! आप लोगों के लिये मैं बड़े ही परिश्रम के साथ दक्षिण देश से दो बहुत ही अदभुत पुस्तकें लाया हूँ। उनमें भक्तितत्त्व का सम्पूर्ण रहस्य भरा पड़ा है।’ इस बात से सभी को बड़ी प्रसन्नता हुई और सभी ने उन दोनों पुस्तकों की प्रतिलिपी कर ली। तभी से गौरभक्तों में उन पुस्तकों का अत्यधिक प्रचार होने लगा।
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महाप्रभु सभी भक्तों को बार बार निहार रहे थे, उनकी आँखें उस भक्त मण्डली में किसी एक अपने अत्यन्त ही प्रिय पात्र की खोज कर रही थीं। जब कई बार देखने पर भी अपने प्रिय पात्र को न पा सकी तब तो आप भक्तों से पूछने लगे- ‘हरिदास जी दिखायी नहीं पड़ते, क्या वे नहीं आये हैं?’
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प्रभु के इस प्रकार पूछने पर भक्तों ने कहा- ‘वे हम लोगों के साथ आये तो थे, किन्तु पता नहीं बीच में कहाँ रह गये।’ इतना सुनते ही दो चार भक्त हरिदास जी की खोज करने चले। उन लोगों ने देखा महात्मा हरिदास जी राजपथ से हटकर एक एकान्त स्थान में वैसे ही जमीन पर पड़े हुए हैं। भक्तों ने जाकर कहा- ‘हरिदास ! चलिये, आपको महाप्रभु ने याद किया है।’
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अत्यन्त ही दीनता के साथ कातर स्वर में हरिदास जी ने कहा- ‘मैं नीच पतित भला मन्दिर के समीप किस प्रकार जा सकता हूँ? मेरे अपवित्र अंग से सेवा पूजा करने वाले महानुभावों का कदाचित स्पर्श हो जायगा, तो यह मेरे लिये असह्य बात होगी।’ मैं भगवान के राजपथ पर पैर कैसे रख सकता हूँ? महाप्रभु के चरणों में मेरा बार बार प्रणाम कहियेगा और उनसे मेरी ओर से निवदेन कर दीजियेगा कि मैं मन्दिर के समीप न जा सकूँगा यहीं कहीं टोटा के समीप पड़ा रहूँगा।’
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भक्तों ने जाकर यह समाचार महाप्रभु को सुनाया। इस बात को सुनते ही महाप्रभु के आनन्द का ठिकाना नहीं रहा। वे बार बार महात्मा हरिदास जी के शील, चरित्र तथा अमानी स्वभाव की प्रशंसा करने लगे। वे भक्तों से कहने लगे- ‘सुन लिया आप लोगों ने, जो इस प्रकार अपने को तृण से भी अधिक नीचा समझेगा, वही कृष्णकीर्तन का अधिकारी बन सकेगा।’
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इतना कहकर महाप्रभु हरिदास जी के ही सम्बन्ध में सोचने लगे। उसी समय मन्दिर के प्रबन्धक के साथ काशी मिश्र भी वहाँ आ पहुँचे।
मिश्र को देखते ही प्रभु ने कहा- ‘मिश्र जी ! इस घर के समीप जो पुष्पोद्यान है उसमें एक एकान्त कुटिया आप हमें दे सकते हैं?’
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हाथ जोड़े हुए काशी मिश्र ने कहा- ‘प्रभो ! यह आप कैसी बात कह रहे हैं। सब आपका ही तो है, देना कैसा? आप जिसे जहाँ चाहें ठहरा सकते हैं। जिसे निकालने की आज्ञा दें वह उसी समय निकल सकता है। हम तो आपके दोस्त हैं, जैसी आज्ञा हमें आप देंगे उसी का पालन हम करेंगे।’
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ऐसा कह काशी मिश्र सभी भक्तों के निवास स्थान की व्यवस्था करने लगे। वाणीनाथ, काशी मिश्र तथा अन्यान्य मन्दिर के कर्मचारी भक्तों के लिये भाँति-भाँति का बहुत सा प्रसाद लदवाकर लाने लगे। महाप्रभु जल्दी से उठकर हरिदास जी के समीप आये।
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हरिदास जी जमीन पर पड़े हुए भगवन्नामों का उच्चारण कर रहे थे। दूर से ही प्रभु को अपनी ओर आते देखकर हरिदास ने भूमि पर लेटकर प्रभु के लिये साष्टांग प्रणाम किया। महाप्रभु ने जल्दी से हरिदास जी को अपने हाथों से उठाकर गले से लगा लिया।
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हरिदास जी बड़ी ही कातर वाणी में विनय करने लगे- ‘प्रभो ! इस नीच अधम को स्पर्श न कीजिये। दयालो ! इसीलिये तो मैं वहाँ आता नहीं था। मेरा अशुद्ध अंग आपके परम पवित्र श्रीविग्रह के स्पर्श करने योग्य नहीं है।’
(क्रमशः)

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