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*सहज सहेलड़ी हे,*
*तूँ निर्मल नैन निहारि ।*
*रूप अरूप निर्गुण आगुण में,*
*त्रिभुवन देव मुरारि ॥*
*बारम्बार निरख जग जीवन,*
*इहि घर हरि अविनाशी ।*
*सुन्दरी जाइ सेज सुख विलसे,*
*पूरण परम निवासी ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २०६)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११४. गौर भक्तों का पुरी में अपूर्व सम्मिलन*
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महाराज ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘इसमें मुझसे पूछने की क्या बात है? आप स्वयं ही सबका प्रबन्ध कर दें। मन्दिर के प्रबन्धक को मेरे पास बुलाइये। मैं उनसे सबके महाप्रसाद की व्यवस्था करने के लिये कह दूँगा। जितने भी भक्त हों उन सबके प्रसाद का प्रबन्ध जब तक वे रहें मन्दिर की ही ओर से होगा।
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आप काशी मिश्र जी से कह दें। वे ही सब भक्तों के ठहरने की व्यवस्था कर दें।’ इतना कहकर महाराज ने उसी समय सेवकों द्वारा सभी व्यवस्था करा दी। महाराज ने भट्टाचार्य से कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय ! मैं महाप्रभु के सभी भक्तों के दर्शन करना चाहता हूँ, आप उन सबका मुझे परिचय करा दीजिये।
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भट्टाचार्य ने कहा- ‘महाराज ! मैं स्वयं सब भक्तों से परिचित नहीं हूँ। नवद्वीप में मेरा बहुत ही कम रहना हुआ है। हाँ, ये आचार्य गोपीनाथ जी प्राय: सभी भक्तों से परिचित हैं, ये आपको सभी भक्तों का भलीभाँति परिचय करा देंगे। आप एक काम कीजिये, अट्टालिका पर चलिये, वहीं से सबके दर्शन भी हो जायँगे और आचार्य सबको बताते भी आयेंगे।’
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भट्टाचार्य सार्वभौम की यह सम्मति महाराज को बहुत पसंद आयी, वे उसी समय अट्टालिका पर चढ़कर कृष्ण-प्रेम में विभोर होकर संकीर्तन और नृत्य करते करते आती हुई और गौर-भक्त-मण्डली को देखने लगे। सभी भक्त प्रेम में पागल बने हुए थे। सभी के कंधों पर उनके ओढ़ने-बिछाने के वस्त्र थे।
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किसी के गले में ढोल लटक रही है, तो किसी के हाथ में करतालें ही हैं। कोई झाँझो को ही बजा रहा है, तो कोई ऊपर हाथ उठा उठाकर नृत्य ही कर रहा है। इस प्रकार भक्तों की पृथक-पृथक 14 मण्डलियाँ बनी हुई हैं। चौदहों ढोल जब एक साथ बजते हैं तब उनकी गगनभेदी ध्वनि से दिशाएँ गूजने लगती हैं।
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महाराज अनिमेष दृष्टि से उस गौर-भक्त-मण्डली की छबि निहारने लगे। गौड़ीय भक्तों ने आगमन का संवाद सुनकर महाप्रभु ने स्वरूपदामोदर और गोविन्द को चन्दन माला लेकर भक्तों के स्वागत के निमित्त पहले से ही भेज दिया था। उन लोगों ने जाकर भक्ताग्रणी श्रीअद्वैताचार्य का सबसे पहले स्वागत किया।
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पहले श्रीस्वरूपदामोदर आचार्य के गले में माला पहनायी और फिर गोविन्द ने भी श्रद्धापूर्वक आचार्य को माला पहनाकर उनकी चरण वन्दना की। आचार्य ने गोविन्द को पहले कभी नहीं देखा था, इसलिये वे स्वरूपगोस्वामी से पूछने लगी- ‘स्वरुपगोस्वामी ! ये महाभाग भक्त कौन है, इन्हें तो मैंने पहले कभी नहीं देखा। क्या ये पुरी के ही कोई भक्त हैं?’
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स्वरूपगोस्वामी ने कहा- ‘नहीं, ये पुरी के नहीं हैं? श्रीईश्वरपुरी महाराज के सेवक हैं, जब वे सिद्धि प्राप्त करने लगे तो उन्होंने इन्हें प्रभु की सेवा में रहने की आज्ञा दी थी। उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके ये प्रभु के समीप आ गये और सदा उनकी सेवा में ही लगे रहते हैं। इनका नाम गोविन्द है। बड़े ही विनयी, सुशील और सरल है।’ गोविन्द परिचय पाकर आचार्य ने उनका आलिंगन किया और सभी को साथ लेकर वे सिंहद्वार की ओर चलने लगे।
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महाराज प्रतापरुद्र जी ने आचार्य गोपीनाथ जी से भक्तों का परिचय कराने के लिये कहा। आचार्य सभी भक्तों का परिचय कराने लगे। वे अंगुली के संकेत से बताने लगे- ‘जिन्होंने इन तेजस्वी वृद्ध भक्त को माला पहनायी है, ये महाप्रभु के दूसरे स्वरूप श्रीस्वरूपदामोदर गोस्वामी हैं, इनके साथ यह महाप्रभु के सेवक गोविन्द हैं। ये आगे आगे जो उत्साह के साथ नृत्य कर रहे हैं, ये परम भागवत अद्वैताचार्य हैं।
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इनके पीछे जो ये चार गौरवर्ण के सुन्दर से पण्डित हैं, वे श्रीवास, वक्रेश्वर, विद्यानिधि और गदाधर हैं। ये चन्द्रशेखर आचार्य हैं। महाप्रभु के पूर्वाश्रम के ये मौसा होते हैं। महाप्रभु के चरणों में इनका दृढ़ अनुराग है। ये शिवानन्द, वासुदेवदत्त, राघव, नन्दन, श्रीमान और श्रीकान्तपण्डित हैं।’ इस प्रकार एक एक करके आचार्य सभी भक्तों का परिचय कराने लगे। भक्तों का परिचय पाकर महाराज को बड़ी प्रसन्नता हुई।
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उसी समय उन्होंने देखा, गौड़ीय भक्त श्रीमन्दिर की ओर न जाकर प्रभु के वासस्थान की ओर जा रहे हैं और भवानन्द के पुत्र वाणीनाथ बहुत सा प्रसाद लिये हुए जल्दी-जल्दी भक्तों से पहले प्रभु के पास पहुँचने का प्रयत्न कर रहे हैं। यह देखकर महाराज ने पूछा- ‘आचार्य महाशय !‘ इन लोगों का प्रभु के प्रति कितना अधिक स्नेह है। बिना प्रभु को साथ लिये ये लोग अकेले भगवान के दर्शन के लिये भी नहीं जाते हैं। हाँ, ये वाणीनाथ इतना प्रसाद क्यों लिये जा रहे हैं?’
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आचार्य ने कहा- ‘महाप्रभु प्रसाद द्वारा स्वयं इन सबका स्वागत करेंगे।’
महाराज ने कहा- ‘तीर्थ में आकर सबसे प्रथम क्षौर उपवास का विधान है, क्या उसे ये लोग न करेंगे?’
आचार्य ने कहा- ‘करेंगे क्यों नहीं, किन्तु प्रभु के प्रेम के कारण उनका सबसे पहले क्षौर ही हो तब प्रसाद पावें ऐसा आग्रह नहीं है। महाप्रभु के हाथ के प्रसाद से ये लोग अपना उपवास भंग नहीं समझते।’
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महाराज ने कहा- ‘आप ठीक कहते हैं, प्रेम में नेम नहीं होता।’
इतना कहकर महाराज अट्टालिका से नीचे उतर आये और मन्दिर के प्रबन्धक से बहुत सा प्रसाद जल्दी से प्रभु के पास और पहुँचाने के लिये कहा। उन लोगों ने पहले से ही सब प्रबन्ध कर रखा था। महाराज की आज्ञा पाते ही उन्होंने और भी प्रसाद पहुँचा दिया।
(क्रमशः)

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