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*दादू तलफै पीड़ सौं, बिरही जन तेरा ।*
*ससकै सांई कारणै, मिलि साहिब मेरा ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११२. प्रेम रस लोलुप भ्रमर भक्तों का आगमन*
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महाप्रभु जब राधाभाव में विरह-वेदना से व्याकुल होकर रुदन करने लगते तब उन्हें ललिताभाव से मनाते और इनके गले में अपनी भुजाओं को डालकर रात भर तक प्रलाप करते रहते। सचमुच गौर भक्तों में स्वरूपदामोदर का जीवन बड़ा ही भावामय, प्रेममय और प्रणयमय था।
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यदि निरन्तरूप से छाया की तरह ये महाप्रभु के साथ न रहते, तो महाप्रभु की बारह वर्ष की गम्भीरा-लीला आज संसार में अप्रकट ही बनी रहती। ये महाप्रभु की नित्य की अवस्था को कड़चा(दैनन्दिनी) में लिखते गये। वही आज भक्तों को परम सुखकारी और मधुरभाव की पराकाष्ठा समझाने वाला ग्रन्थ स्वरूपदामोदर के कड़चा के नाम से प्रसिद्ध है।
महाप्रभु इनके प्रति अत्यधिक स्नेह था। महाप्रभु के मनोगत भावों को जिस उत्तमता के साथ ये समझ लेते थे, उस प्रकार कोई भी उनके भावों को नहीं समझ सकता था। ‘अमुक विषय में महाप्रभु की क्या सम्मति होगी।’ इसे ये यों ही सरलतापूर्वक बता देते थे और इसमें प्राय: भूल होती ही नहीं थी।
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महाप्रभु को भक्तिविहीन भजन, काव्य अथवा पद सुनने से घृणा थी, इसलिये महाप्रभु को कुछ सुनाने के पूर्व वह स्वरूपदामोदर को सुना दिया जाता। उनकी आज्ञा प्राप्त होने पर ही वह पीछे से प्रभु को सुनाया जाता। जैसे ये गम्भीर-प्रकृति, शान्त और एकान्तप्रिय थे वैसे ही इनका कण्ठ भी बड़ा मधुर और सुरीला था।
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ये महाप्रभु को विद्यापति ठाकुर, महाकवि चण्डीदास के पद तथा गीत-गोविन्द आदि भक्ति सम्बन्धी ग्रन्थों के श्लोक गा गाकर सुनाया करते थे। प्रभु जब तक इनके पदों को नही सुन लेते थे। तब तक उनकी तृप्ति नहीं होती थी। इनके गुण अनंत हैं। महाप्रभु उन्हें ही जान सकते थे। उन्हें महाप्रभु ही जान सकते थे। इसीलिये महाप्रभु को इनके आगमन से सबसे अधिक प्रसन्नता हुई।
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प्रभु कहने लगे- ‘तुम आ गये, इससे मुझे कितनी प्रसन्नता हूई, उसे व्यक्त करने में मैं असमर्थ हूँ, सचमुच तुम्हारे बिना मैं अन्धा था। तुमने आकर ही मुझे आलोक प्रदान किया है। मैं सदा तुम्हारे विषय में स्वप्न में देखा था कि तुम आ गये हो और खड़े खड़े मुसकरा रहे हो, सो सचमुच ही आज तुम आ गये। तुमने यह बड़ा ही उत्तम कार्य किया जो यहाँ चले आये। अब मुझे छोड़कर मत चले जाना।’
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प्रेमपूर्ण स्वर से धीरे धीरे स्वरूपदामोदर ने कहा- ‘प्रभो ! मैं स्वयं आपके चरणों में आ ही कैसे सकता हूँ। जब मेरे पाप उदय हुए तभी तो आपके चरणों से पृथक होकर मैं अन्यत्र चला गया। अब जब आपने अनुग्रह करके बुलाया है, तो बरबस आपके प्रेमपाश में बँधा हुआ चला आया हूँ और जब तक चरणों में रखेंगे, तब तक मैं कहीं अन्यत्र जा ही कैसे सकता हूँ?’ यह कहकर स्वरूप प्रभु के चरणों में गिर पड़े। महाप्रभु उन्हें उठाकर उनकी पीठ पर धीरे धीरे हाथ फेरते रहे। उस दिन से स्वरूपदामोदर सदा प्रभु के समीप ही बने रहे।
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एक दिन एक सरल से पुरुष ने आकर प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और वह हटकर हाथ जोड़े हुए खड़ा हो गया। महाप्रभु के समीप उस समय सार्वभौम भट्टाचार्य, नित्यानन्द और बहुत से भक्त बैठे हुए थे। महाप्रभु ने उस विनयी पुरुष से पूछा- ‘भाई ! तुम कौन हो और कहाँ से आये हो?’
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उस पुरुष ने बड़ी ही सरलता के साथ धीरे धीरे उत्तर दिया- ‘प्रभो ! मैं पूज्य श्री ईश्वरी पुरी महाराज का भृत्य हूँ। पुरी महाराज मुझे ‘गोविन्द’ के नाम से पुकारते थे। सिद्धि लाभ करते समय मैंने उनसे प्रार्थना की कि मेरे लिये क्या आज्ञा होती है। तब उन्होंने मुझे अपनी सेवा में रहने की आज्ञा दी। उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके मैं आपके श्रीचरणों में उपस्थित हुआ हूँ। मेरे एक दूसरे गुरुभाई काशीश्वर और हैं। वे तीर्थयात्रा करने के निमित्त चले गये हैं। तीर्थयात्रा करके वे भी श्रीचरणों के समीप ही आकर रहेंगे। अब मुझे जैसी आज्ञा हो।’
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इतना सुनते ही प्रभु का गला भर आया। उनकी आँखों की कोर अश्रुओं से भीग गयी। पुरी महाराज के प्रेम का स्मरण करके वे कहने लगे- ‘पुरी महाराज का मेरे ऊपर सदा वात्सल्य स्नेह रहा है। यद्यपि मुझे मन्त्र-दीक्षा देकर न जाने वे कहाँ चले गये; तब से उनके फिर मुझे दर्शन ही नहीं हुए। फिर भी वे मुझे भूले नहीं। मेरा स्मरण उन्हें अन्त तक बना रहा। अहा ! अन्त समय में उन महापुरुष ने मेरा स्मरण किया, इससे अधिक मेरे ऊपर उनकी और कृपा हो ही क्या सकती है?
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मैं अपने भाग्य की कहाँ तक प्रशंसा करूँ, मैं अपने सौभाग्य की किस प्रकार सराहना करूँ जो अन्तर्यामी गुरुदेव ने शरीर त्यागते समय भी अपनी वाणी से मेरा नामोच्चार किया। सार्वभौम महाशय ! आप ही मुझे सम्मति दें कि मैं इनके बारे में क्या करूँ। ये मेरे गुरु महाराज के सेवक रहे हैं, इसलिये मेरे भी पूज्य हैं, इनसे मैं अपने शरीर की सेवा कैसे करवा सकता हूँ और यदि इन्हें अपने समीप नहीं रखता हूँ तो गुरु-आज्ञा का भंग होता है। अब आप ही बताइये मुझे ऐसी दशा में क्या करना चाहिये?’
सार्वभौम ने कहा- ‘प्रभो ! ‘गुरोराज्ञा गरीयसी’ गुरु की आज्ञा ही श्रेष्ठ है। गोविन्द सुशील हैं, नम्र हैं, आपके चरणों में इनका स्वाभाविक अनुराग हैं। सेवाकार्य में ये प्रवीण हैं। इसलिये इन्हें अपने शरीर की सेवा का अप्राप्य सुख प्रदान करके अपने गुरु महाराज की भी इच्छापूर्ति कीजिये और इन्हें भी आनन्द दीजिये।
(क्रमशः)

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