मंगलवार, 5 मई 2020

*११८. श्री जगन्‍नाथ जी की रथ यात्रा*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*नीके मोहन सौं प्रीति लाई ।*
*तन मन प्राण देत बजाई, रंग रस के बनाई ॥टेक॥*
*ये ही जीयरे वे ही पीवरे, छोड्यो न जाई, माई ।*
*बाण भेद के देत लगाई, देखत ही मुरझाई ॥१॥*
*निर्मल नेह पिया सौं लागो, रती न राखी काई ।*
*दादू रे तिल में तन जावे, संग न छाडूं माई ॥२॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. २९४)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११८. श्री जगन्‍नाथ जी की रथ यात्रा*
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श्रीवास पण्डित, रमाई पण्डित, रघुनाथ, मुकुन्‍द, हरिदास, गोविन्‍दानन्‍द माधव और गोविन्‍द ये प्रधान गायक हुए और नृत्‍यकारी स्‍वयं महाप्रभु हुए। चौदह ढोलों की गगनभेदी ध्‍वनि साथ ही भक्‍तों के हृदय-सागर को उद्वेलित करने लगी। महाप्रभु के उन्‍मादी नृत्‍य से सभी दर्शक चकित रह गये। वे चित्र के लिखे से चुपचाप एकटक होकर प्रभु के अलौकिक नृत्‍य को देख रहे थे।
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आकाश में कोलाहल - सा सुनायी देने लगा। मानो देवता भी अपने अपने विमानों पर चढ़कर प्रभु के नृत्‍य को देखने के लिये आकाश में खड़े हों। सभी भक्‍त महाप्रभु को घेरकर नृत्‍य करने लगे। महाप्रभु ने थोड़ी देर में नृत्‍य बंद कर दिया। सभी बाजे बंद हो गये। चारों ओर बिलकुल सन्‍नाटा छा गया। तब महाप्रभु ने अपने कोकिल कूजित कण्‍ठ से बड़ी करुणा के साथ जगन्‍नाथ जी की स्‍तुति करने लगे। भक्‍तों ने भी प्रभु के स्‍वर में स्‍वर मिलाया।
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जयति जयति देवो देवकीनन्‍दनौऽसौ।
जयति जयति कृष्‍णो वृष्णिवंशप्रदीप:।
जयति जयति मेघश्‍यामल: कोमलांगो
जयति ज‍यति पृथ्‍वीभारहारो मुकुन्‍द॥[१]
देवकीनन्‍दन ! भगवान की जय हो, जय हो। वृष्णिवंशातंस श्रीकृष्‍ण की जय हो, जय हो। मेघ के समान श्‍यामवर्ण वाले सुन्‍दर सलोने श्‍याम की जय हो, जय हो। पृथ्‍वी का भार हरण करने वाले भगवान मुकुन्‍द की जय हो, जय हो।
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नहां विप्रो न च नरपतिर्नापि वैश्‍यो न शूद्रो
नाहं वणीं न च गृहपतिर्नो वनस्‍थो यतिर्वा।
किन्‍तु प्रोद्यन्निखिलपरमानन्‍दपूर्णामृताब्‍धे-
र्गोपीभर्तु: पदकमलयोर्दासदासानुदास:॥[२]
न तो मैं ब्राह्मण हूँ, न क्षत्रिय, न वैश्‍य और न शूद्र। मैं न तो ब्रह्मचारी हूँ न गृहस्‍थ, न वानप्रस्‍थ और न संन्‍यासी, तब हूँ कौन? स्‍वत: प्रकाशस्‍वरूप निखिल परमानन्‍दपूर्ण, अमृत समुद्ररूप गोपीवल्‍लभ श्रीकृष्‍ण के पदकमलों के दासानुदासों का दास हूँ।

‘दासानुदास’ यह पद समाप्‍त हुआ कि फिर झाँझ, मृदंग और खोल स्‍वत: ही बजने लगे। रथ घर-घर शब्‍द करके फिर चलने लगा। महाप्रभु फिर उसी भाँति उद्दाम नृत्‍य करने लगे। उनके सम्‍पूर्ण शरीर में स्‍तम्‍भ, स्‍वेद, पुलक, अश्रु, कम्‍प, वैवर्ण, स्‍वरविकृति आदि सभी सात्त्विक विकारों का उदय होने लगा। उनके शरीर के सम्‍पूर्ण रोम एकदम खड़े हो गये, दाँत कड़ाकड़ बजने लगे।
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स्‍वर भंग एकदम हो गया, चेष्‍टा करने पर ठीक ठीक शब्‍द मुख से नहीं निकलते थे। आँखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी। पसीने का तो कुछ पूछना ही नहीं। मानो सुवर्ण के सुमेरु पर्वत से असंख्‍य नदियाँ निकल रही हों मुख में से झाग निकल रहे थे। कभी कभी लेट जाते, फिर उठ पड़ते और अलातचक्र की भाँति चारों ओर घूमने लगते।
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प्रभु के उद्दण्‍ड नृत्‍य से रथ का चलना बंद हो गया। भक्‍तगण महाप्रभु की ऐसी विचित्र अवस्‍था देखकर भय के कारण काँपने लगे। दर्शनार्थी महाप्रभु के नृत्‍य को देखने के लिये टूट ही पड़ते थे। नित्‍यानन्‍द जी को बड़ी घबड़ाहट होने लगी। लोगों की भीड़ प्रभु के ऊपर को ही चली आ रही थी।
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तब नित्‍यानन्‍द जी ने अपने भक्‍तों की एक गोल मण्‍डली बना ली और उसके भीतर प्रभु को ले लिया। महाराज ने भी उसी समय अपने नौकरों को फौरन आज्ञा दी कि इस भक्‍त मण्‍डली के गोल को तुम लोग चारों ओर से घेर लो, जिससे और लोग इस मण्‍डली को धक्‍का न दे सकें ! महाराज की आज्ञा उसी समय पालन की गयी और भक्‍त मण्‍डली की रक्षा का प्रबन्‍ध राजकर्मचारियों ने उसी समय कर दिया।

महाराज प्रतापरुद्र भी अपने मन्‍त्री श्रीहरिचन्‍दनेश्‍वर के कंधे पर हाथ रखे हुए महाप्रभु के उद्दण्‍ड नृत्‍य को देख रहे थे। महाराज के सामने ही दीर्घकाय श्रीवास पण्डित भाव में विभोर हुए खड़े थे। महाराज प्रभु के नृत्‍य को एकटक होकर देख रहे थे; किन्‍तु सामने खड़े हुए श्रीवास पण्डित बार बार झूम झूमकर महाराज के देखने में विघ्‍न डालते।
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राजमन्‍त्री हरिचन्‍दनेश्‍वर उन्‍हें बार बार टोंचते और वहाँ से हट जाने का संकेत करते, किन्‍तु हरिसमदिरा में मत्त हुए भक्‍त श्रीवास किसकी सुनने वाले थे। मन्‍त्री जी बड़े आदमी होंगे तो राज्‍य के होंगे, भक्‍तों के लिये तो यहाँ सभी समान ही थे। बार बार टोंचने पर भावावेश में भरे हुए श्रीवास पण्डित को एकदम क्षोभ हो उठा।
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उन्‍होंने आव गिना न ताव, बड़े जोरों से कसकर एक झापड़ राजमन्‍त्री चन्‍दनेश्‍वर के सुन्‍दर लाल कपोल पर जमा दिया। उस जोर के चपत के लगते ही मन्‍त्री महोदय अपना सभी मन्‍त्रीपन भूल गये, गाल एकदम और अधिक लाल पड़ गया। सम्‍पूर्ण शरीर में झनझनी फैल गयी। राजमन्‍त्री हक्‍के बक्‍के से होकर चारों ओर देखने लगे। उस समय बेहोशी मे उन्‍हें मान-अपमान का कुछ भी ध्‍यान नहीं हुआ।
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गहरी चोट लगने पर जैसे रक्‍त को देखकर पीछे से दु:ख होता है, उसी प्रकार झापड़ खाकर जब राजमन्‍त्री ने अपने चारों ओर देखा तब उन्‍हें अपने अपमान का भान हुआ। उसी समय उन्‍होंने अपने मन्‍त्रीपने की तेजस्विता दिखायी ! श्रीवास पण्डित को उसी समय इसका मजा चखाने के लिये वे कर्मचारियों को कठोर आज्ञा देने लगे।
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परन्‍तु बुद्धिमान महाराज ने उन्‍हें शान्‍त करते हुए कहा- आप यह कैसी बात कर रहे हैं? देखते नहीं, ये भाव में विभोर हैं। आपका परम सौभाग्‍य हैं, जो ऐसे भगवद भक्‍त ने भगवान के भाव में आपके कपोल का स्‍पर्श किया। यह इनकी आपके ऊपर असीम कृपा ही है। यदि हमें इनके इस झापड़ का सौभाग्‍य प्राप्‍त होता तो हम आज अपने को सबसे बड़ा भाग्‍यशाली समझते। आप अपने रोष को शान्‍त कीजिये और महाप्रभु के कीर्तन रस का आस्‍वादन कीजिये।
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इस प्रकार महाराज के समझाने पर हरिचन्‍दनेश्‍वर राजमन्‍त्री शान्‍त हुए, नहीं तो उसी समय रंग में भंग हो जाता। मालूम पड़ने पर श्रीवास पण्डित बहुत अधिक लज्जित हुए। महाप्रभु को इन बातों का कुछ भी पता नहीं था, वे उसी भाव में उद्दण्‍ड नृत्‍य कर रहे थे।
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न उन्‍हें लोगों का पता था, न राजा तथा राजमन्‍त्री का। वे जोरों से नृत्‍य करते, कभी किसी का आलिंगन कर लेते, कभी किसी का चुम्‍बन करते, कभी किसी का हाथ पकड़क रही नृत्‍य करने लगते। दर्शनार्थी प्रभु के चरणों के नीचे की धूलि उठा-उठाकर सिर पर चढ़ाते। भक्‍त वृन्‍द उस चरणरेणु को अपने अपने शरीर में मलते। इस प्रकार बड़ी देर तक महाप्रभु नृत्‍य करते रहे।
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नृत्‍य करते करते प्रभु थककर बैठ गये और स्‍वरूप को आज्ञा दी कि किसी पद का गायन करो। गायनाचार्य दूसरे गौरचन्‍द्र श्रीस्‍वरूपदामोदर गोस्‍वामी गाने लगे -
सेई त परान नाथ पाईनू।
यहा लागि मदन दहन झूरि गेनू॥
पद के साथ ही साथ वाद्य बजने लगे। हरि, हरि करके भक्‍त नाचने लगे।
(क्रमशः)

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