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*पंच पदारथ मन रतन, पवना माणिक होइ ।*
*आतम हीरा सुरति सौं, मनसा मोती पोइ ॥*
*अजब अनूपम हार है, सांई सरीषा सोइ ।*
*दादू आतम राम गल, जहाँ न देखे कोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *गुरु भक्ति*
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श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के शिष्य विष्णुपुरीजी काशी रहा करते थे । कुछ साधुओं ने महाप्रभु से कहा - 'विष्णुपुरी मुक्ति के लिये काशी में ठहरे हैं ।' महाप्रभु बोले - "नहीं, उन्हें न मुक्ति से, न किसी देवता से और न काशी से ही कुछ प्रयोजन है । श्री कृष्ण चिन्तन को छोड़ कर उनकी चित्त वृति कहीं भी नहीं जाती । केवल सत्संग के लिये ही काशी में ठहरे हुए हैं ।
फिर भी जब लोगों ने नहीं माना तो महाप्रभु ने विष्णुपुरी को एक रत्नमाला भेजने के लिये लिखा । वे गुरु भक्त थे महाप्रभु के हृदय की बात जान गये और भागवत रूप समुद्र से पांच सौ श्लोक रूप रत्न चुन करके तथा "भक्ति रत्नावलि" नाम रख करके भेज दिया ।
उसे जब देखा तो सबको निश्चय हो गया कि वे अनन्य भक्त तथा गुरुनिष्ठ है । इससे सूचित होता है कि गुरु भक्त ही गुरु के भाव को भली भांति जान सकता है ।
सुगुरु भक्त गुरुभाव को, समझ सके भल रीति ।
भेजी भक्ति रत्नावली, विष्णुपुरी सहप्रीति ॥२३१॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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