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*कहै दादू जन जो कृत धारै, भलो बुरो फल ताही लारै ।*
*झूठा परगट साचा छानै, तिन की दादू राम न मानै ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कृपण का अंग १२०*
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सूम मते१ के सूत सौं, बांधे माया पंख ।
ब्रह्म व्योम२ क्यों जाँहि उड़ि, पंखी प्राणि असंख३ ॥१७॥
कृपण के सिद्धान्त१ रूप सूत से माया रूप पंख बांध लिये तो भी क्या हो ? जैसे असंख्य२ पक्षी आकाश में जाते हैं वैसे बंधे हुए पंखों वाला प्राणी उड़कर आकाश२ में कैसे जायेगा ? वैसे ही माया संग्रह करने मात्र से ही कृपण ब्रह्म को प्राप्त नहीं हो सकता ।
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स्वर्ग धाम धर्मिष्ट१ का, पापी नरक समाय ।
जन रज्जब जति२ ज्योति दिशि, सूम३ सर्प कहँ जाय ॥१८॥
धर्मात्मा१ का स्वर्ग धाम प्राप्त होता है, पापी नरक में जाता है । सर्प ज्योति की और कहां जाता है ? वैसे ही कृपण३ यतियों२ की सेवा द्वारा ब्रह्म की ओर कहां जाता है ।
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स्वर्ग सदन१ सुकृत रहै, कुकृत नरक निवास ।
रज्जब संशय सूम२ का, कहां करेगा वास ॥१९॥
सुकर्म करने वाले तो स्वर्ग रूप घर१ में रहते हैं और कुकर्म करने वालों का निवास नरक में होता है किन्तु कृपण२ कहां निवास करेगा ? यंह संशय है अर्थात धन के पास सर्प वा भूत होकर रहेगा ।
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जन रज्जब श्रम१ सूम करि, कृपण कमाई कोड़ि२ ।
स्वारथ परमारथ नहीं, गये माल मन ओडि३ ॥२०॥
कृपणों ने अत्याधिक परिश्रम१ करके कृपणता से कोटिन२ की सम्पति कमाली किन्तु उसे न तो स्वार्थ में खर्च की और न परमार्थ में ही लगाई, अंत३ में कृपणों के मन धन की ओर ही गये हैं और वे उस पर सर्प वा भूत बन कर रहे हैं ।
(क्रमशः)

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