रविवार, 31 मई 2020

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग हुसेनी बँगाल १७ (गायन समय पहर दिन चढ़े चन्द्रोदय ग्रँथ के मतानुसार)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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२९० - (गुजराती) विनय । त्रिताल
तूँ घर आव सु क्षण पीव ।
हिक तिल मुख दिखलावहु तेरा, क्या तरसावै जीव ॥टेक॥
निश दिन तेरा पँथ निहारूँ, तूँ घर मेरे आव ।
हिरदा भीतर हेत सौं रे वाहला, तेरा मुख दिखलाव ॥१॥
वारी फेरी बलि गई रे, शोभित सोई कपोल ।
दादू ऊपरि दया करीनें, सुनाइ सुहावे बोल ॥२॥
इति राग हुसेनी बँगाल समाप्त: ॥१७॥पद २॥
दर्शनार्थ विनय कर रहे हैं - हे मेरे शुभ लक्षणों युक्त प्रियतम ! आप मेरे हृदय घर में पधारिये । मुझे थोड़ा - सा दर्शन देने के लिए भी आप मेरे मन को इतना क्यों तरसा रहे हैं ? 
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मैं दिन - रात आपका मार्ग देख रही हूँ, आप मेरे घर पधारिये । प्रियतम ! हृदय घर में आकर प्रेम पूर्वक अपना सुन्दर शोभा युक्त कपोलों वाला मुख दिखलाइये । 
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मैं अपना सब कुछ आप पर निछावर करके आपकी बलिहारी जा रही हूं । आप मुझ पर दया करके, मुझे प्रिय लगें ऐसे वचन सुनाने की कृपा कीजिये ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका राग हुसेनी बँगाल समाप्त : ॥१७॥
(क्रमशः)

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