मंगलवार, 19 मई 2020

= ११० =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*मन मनसा का भाव है, अन्त फलेगा सोइ ।*
*जब दादू बाणक बण्या, तब आशय आसण होइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)*
====================
साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भक्त*
###################
अरब देश के खस नामक कुटुम्ब का एक सरदार था । उसकी पुत्री का नाम हसीना था और हमीदा उसकी समान अवस्था वाली सखी थी । भ्रमण करते हुवे एक भारतीय कृष्ण भक्त संत अरब में जा पहुंचे । भाग्यवश उसकी भेट हसीना के पिता से हो गई । संत ने उसका आतिथ्य स्वीकर किया ।
.
सतसंग होने लगा, उसमें व्रज की महिमा के साथ बिहारी श्री कृष्ण के रहस्य का भी वर्णन हुआ । उसे सुनकर हसीना कृष्ण दर्शन के लिये आतुर होकर सूखने लगी । पिता ने बगदाद जाने वाले व्यापारी यात्रियों के साथ हसीना, उसका भाई अब्दल्ला और सखी हमीदा को भारत भेज दिया । मार्ग में एक नदी तट पर डेरा डाला ।
.
शरद ऋतु थी, रात चांदनी थी । दोनों सखियां एकान्त में जाकर श्री कृष्ण के चिन्तन मे मगन हो गई । पीछे से काफिले पर डाकुओं का दल टूट पङा । दोनों दलों मे युद्ध हुआ किन्तु डाकुओं ने काफिला का बहुत सा भाग नष्ट कर दिया औद धन लेकर इधर ऊधर चले गये । हमीदा का भाई और कुछ स्त्रीयां बची थी, उनका रोना सुन कर हसीना-हमीदा का ध्यान टूटा ।
.
वे दोनों वहां गई, इतने मे ही दो चार डाकुओं ने उन्हे बेच कर धन प्राप्त करने की आशा से दोनों को पकङ लिया । फिर हिजियों का भेष बना कर इधर ऊधर फिरने लगे । हसीना ने किसी युक्ति से एक महिला के द्वारा अपनी विपद् ग्रस्त अवस्था का पत्र लिखकर उस देश के खलिफा के पास पहुंचाया । पत्र मिलते ही उन कपट धारियों को पकङ लिया और हसीना हमीदा को अपने महल में भेज दिया ।
.
बेगम ने उनकी सारी सारी स्थिति जानकर युद्ध निपुण सिपाहियों के साथ वृन्दावन भेज दिया । वे किसी मंदिर में भगवान के दर्शन करने जाने लगी किन्तु पुजारियों ने विधर्मी कह कर रोक दिया । फिर वे यमुना तट पर एक कदम्ब की छाया में बैठकर श्रीकृष्ण का ध्यान करने लगी ।
.
आधी रात को भगवान श्री कृष्ण और राधाजी अपनी सखियों के साथ एक नौका में दिव्य सिंहासन पर बैठकर हसीना हमीदा के पास आये । नौका किनारे लगी, उनमें से एक सखी उतरी और हसीना और हमीदा के पास जाके उनका सब वृत्तांत जानकर कहा - 'जिनके लिये तुम इतने कष्ट पाकर अरब देश से यहां आई हो, वे ही श्रीकृष्ण और राधिका इस नौका में दिव्य सिंहासन पर विराज रहे हैं । वे तुम्हारा सब वृत्तांत जानते हैं तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हे दर्शन देने के लिये आये हैं । सखी उन दोनों को साथ लेकर नौका पर गई ।
.
हसीना हमीदा ने अपने मस्तक भगवान के चरणों में रख दिये और दोनों भगवान के नित्य बिहार में सम्मलित हो गई । इससे सूचित होता है कि भक्त की सच्ची लगन नहीं मिट सकती ।
भक्त लग्न मिटती नहीं, विघ्न किते ही होय ।
आय मिली श्रीकृष्ण को, हसीना हमीदा दोय ॥३५०॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें