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*इहि विधि सेवा सदा तहँ होई,*
*अलख निरंजन लखै न कोई ॥*
*ये पूजा मेरे मन मानै,*
*जिहि विधि होइ सु दादू न जानै ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३१०)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *प्रेम भक्ति*
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सन्डीले के सूबेदार सूरदास मदन मोहन के मन में एक दिन बाजार में अति उत्तम खाण्ड(शक्कर) देखकर के भाव उठा कि - 'यह तो भगवान के मालपूओं के योग्य है । खरीद कर के वृन्दावन भेजने की आज्ञा दी । सेवक ने कहा - 'यहां से भेजने से किराया बहुत लगेगा और मिश्री से भी अधिक महँगी पड़ेगी ।' सूरदास मदन मोहन ने कहा - 'खर्च की क्या बात है ? भगवान प्रीति पर दृष्टि होनी चाहिये ।' गाड़ियां भरवा कर भेज दी । रात्रि को वृन्दावन पहुंची ।
पुजारियों ने यह सोच कर कि इसका भोग कल लगेगा, भण्डार में रखवा दी । भगवान अपने प्रेमी की भेजी हुई वस्तु को प्राप्त करने के लिये अधीर हो गये और रात्रि को ही गोसांईजी को स्वप्न में कहा - 'सूरदास मदन मोहन की खाण्ड के मालपुऐ अभी बना कर हमारे भोग लगाओ । गोसांईजी ने वैसा ही किया । इससे सूचित होता है कि प्रेमी की वस्तु को प्राप्त करने के लिये भगवान अति उतावले हो जाते हैं ।
हरि उतावले होत है, प्रेमी वस्तु के हेत ।
मदन मोहन की खांड हित, निशि में आज्ञा देत ॥३१४॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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