🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग टोडी(तोडी) १६ (गायन समय दिन ६ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
२८२ - भेष बिडँवन । ललित ताल
हम पाया, हम पाया रे भाई,
भेष बनाय ऐसी मन आई ॥टेक॥
भीतर का यहु भेद न जानैं,
कहै सुहागिनि क्यों मन मानैं ॥१॥
अंतर पीव सौं परिचय नाँहीं,
भई सुहागिनि लोगन माँहीं ॥२॥
सांई स्वप्ने कबहुं न आवैं,
कहबा ऐसे महल बुलावैं ॥३॥
इन बातन मोहि अचरज आवै,
पटम१ किये कैसे पिव पावै ॥४॥
दादू सुहागिनि ऐसे कोई,
आपा मेट राम रत होई ॥५॥
सँत - भेष के समान स्वरूप बनाने वालों के दँभ का परिचय दे रहे हैं, दँभी प्राणी सँत के समान भेष बनाकर कहता है...
.
भाइयो ! हमने प्रभु को प्राप्त कर लिया है, अवश्य प्राप्त कर लिया है । प्रतिष्ठा के लिये उसके मन में यह दँभपूर्ण भावना आती है ।
.
वह अपने अन्त:करण के भोग - राग रूप वो भीतर स्थित आत्मा - राम रूप रहस्य को तो नहीं जानता और अपने को प्रभु प्राप्ति रूप सुहाग से युक्त कहता है,
.
परन्तु इस प्रकार कहने से प्रभु तथा हमारा मन कैसे माने ? भीतर तो प्रभु से परिचय नहीं हुआ है केवल दँभ से सँसारी लोगों में अपने को प्रभु सँयोग रूप सुहाग से युक्त कहता है ।
.
प्रभु तो कभी स्वप्न में भी हृदय में नहीं आते और कहता ऐसा है - मेरे हृदय - महल में प्रभु को प्रतिदिन बुलाता हूं ।
.
ऐसी बातों से हमें बड़ा आश्चर्य होता है । पाखँड१ करने से प्रभु कैसे मिलेंगे ?
.
जो सब प्रकार का अहँकार नष्ट करके राम में अनुरक्त होता है, ऐसा कोई महानुभाव ही प्रभु प्राप्ति रूप सुहाग से युक्त होता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें