शनिवार, 23 मई 2020

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग टोडी(तोडी) १६ (गायन समय दिन ६ से १२)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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२८२ - भेष बिडँवन । ललित ताल
हम पाया, हम पाया रे भाई, 
भेष बनाय ऐसी मन आई ॥टेक॥
भीतर का यहु भेद न जानैं, 
कहै सुहागिनि क्यों मन मानैं ॥१॥
अंतर पीव सौं परिचय नाँहीं, 
भई सुहागिनि लोगन माँहीं ॥२॥
सांई स्वप्ने कबहुं न आवैं, 
कहबा ऐसे महल बुलावैं ॥३॥
इन बातन मोहि अचरज आवै, 
पटम१ किये कैसे पिव पावै ॥४॥
दादू सुहागिनि ऐसे कोई, 
आपा मेट राम रत होई ॥५॥
सँत - भेष के समान स्वरूप बनाने वालों के दँभ का परिचय दे रहे हैं, दँभी प्राणी सँत के समान भेष बनाकर कहता है... 
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भाइयो ! हमने प्रभु को प्राप्त कर लिया है, अवश्य प्राप्त कर लिया है । प्रतिष्ठा के लिये उसके मन में यह दँभपूर्ण भावना आती है । 
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वह अपने अन्त:करण के भोग - राग रूप वो भीतर स्थित आत्मा - राम रूप रहस्य को तो नहीं जानता और अपने को प्रभु प्राप्ति रूप सुहाग से युक्त कहता है, 
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परन्तु इस प्रकार कहने से प्रभु तथा हमारा मन कैसे माने ? भीतर तो प्रभु से परिचय नहीं हुआ है केवल दँभ से सँसारी लोगों में अपने को प्रभु सँयोग रूप सुहाग से युक्त कहता है । 
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प्रभु तो कभी स्वप्न में भी हृदय में नहीं आते और कहता ऐसा है - मेरे हृदय - महल में प्रभु को प्रतिदिन बुलाता हूं । 
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ऐसी बातों से हमें बड़ा आश्चर्य होता है । पाखँड१ करने से प्रभु कैसे मिलेंगे ? 
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जो सब प्रकार का अहँकार नष्ट करके राम में अनुरक्त होता है, ऐसा कोई महानुभाव ही प्रभु प्राप्ति रूप सुहाग से युक्त होता है ।
(क्रमशः)

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