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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू साचा साहिब सेविये, साची सेवा होइ ।*
*साचा दर्शन पाइये, साचा सेवक सोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*साँच निर्भय का अंग ११८*
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चोरी की तहं चोर है, नांहि की तहं नांहिं ।
रज्जब पकड़े झूठ परि, दहै न सो दिब१ माँहिं ॥२९॥
चोरी करी तब चोर कहलाता है नहीं करे तो नहीं कहलाता है, यदि झूठ बोलने पर पकड़ भी ले तो परीक्षार्थ हाथ पर धरा जाने वाला तप्त लोहा का गोला१ नहीं जलाता ।
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देही१ दखल२ न दिब३ का, जे एक सांच लघु होय ।
तो रज्जब क्या भूत भय, जिहि सत सुमिरण दोय ॥३०॥
यदि एक छोटा सा भी सत्य हो तो शरीर१ के हाथ पर परिक्षार्थ रखे हुये तप्त लोह के गोले३ का अधिकार२ नहीं होता अर्थात वह नहीं जलाता, तब जिसमे सत्य और हरि-स्मरण दो हैं, उसे तो भूतों का भय ही क्या है ?
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भजन विमुख घटि१ साँच व्है, ताहि न दिब२ दुख देत ।
तो रज्जब तिन को न डर, जहं सुमिरण साँच सहेत ॥३१॥
भगवद् भजन से विमुख शरीर१ में भी यदि सत्य हो तो परीक्षार्थ हाथ में रक्खा जाने वाला लोह का गोला२ जलाना रूप दु:ख नहीं देता, फिर जिनके हृदय में सत्य के सहित हरि-समरण है उसको कोई भी डर नहीं है । इस प्रकार प्राणी सत्य से निर्भय होता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित साँच निर्भय का अंग ११८ समाप्तः ॥सा. ३६२७॥
(क्रमशः)

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