मंगलवार, 19 मई 2020

माया का अंग १६९/१७२

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*नारी बैरिन पुरुष की, पुरुषा बैरी नार ।* 
*अंत काल दोन्यूं मुये, दादू देख विचार ॥१६९॥* 
*नारी पुरुष को ले मुई, पुरुषा नारी साथ ।* 
*दादू दोनों पच मुये, कछू न आया हाथ ॥१७०॥* 
विद्वान पुरुषों को विचार दृष्टि से देखना चाहिये कि यह नारी मनुष्य के लिये औए मनुष्य नारी के लिये शत्रु है, क्योंकि ये दोनों एक दूसरे के पतन के कारण बनते हैं । अतः जिज्ञासु को चाहिये कि काम वासना से नारी को कभी न देखे और नारी भी काम वासना से वासित मन से मनुष्य को न देखे । अन्यथा अन्त में वासना के कारण दोनों का परमार्थ मार्ग से पतन निश्चित है । वासना भी किसी की तृप्त नहीं होती क्योंकि महाभारत में लिखा है कि- मनुष्य की काम वासना कभी भी भोग के द्वारा शान्त नहीं होती । प्रत्युत अग्नि में घृत की आहुति डालने पर जैसे अधिक प्रज्ज्वलित होती है ऐसे ही भोगों से काम वासना बढ़ती है । 
भर्तृहरि लिख रहे हैं कि- हे तात ! इस त्रिभुवन में सारे संसार को खोजते हुए हमने ऐसा पुरुष नहीं देखा और न सुना, जो विषय रूपी हथिनी के साथ दृढ़ आसक्ति से उन्मत्त हुए अपने अन्तःकरण रूपी हाथी को संयमरूपी नाल से बांधता हो । 
*भँवरा लुब्धी बास का, कमल बँधाना आइ ।* 
*दिन दश माँहैं देखतां, दोनों गये विलाइ ॥१७१॥* 
भोगी पुरुष भंवर की तरह भोग वासना रूपी गन्ध से लुभायमान होकर स्त्री के मुख कमल पर आसक्त होकर बंध जाता है और उस वासना गन्ध से अतृप्त हुआ भंवर की तरह कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाता है । 
लिखा है कि- कोई भौंरा कमल के पुष्प की गन्ध को सूंघता हुआ सूर्यास्त होने पर कमल पुष्प के मध्य बंध होने पर रात्रि में विचार कर रहा है कि- रात्रि अवश्य पूरी होने पर जब सूर्य उदय होगा तब कमल का पुष्प भी अवश्य खिलेगा, मैं उडकर चला जाऊंगा, कमल कोश में बंधा हुआ भौंरा यह विचार ही कर रहा था इतने में कोई हाथी उस कमलिनी को तोड़कर अपने पैरों के नीचे कुचल देता है और भौंरा मर जाता है । इस प्रकार जीव भी विचार करता रहता है परन्तु स्त्री की आसक्ति को त्याग नहीं सकता, किन्तु अन्त में मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । 
भर्तृहरि लिखते हैं कि- स्त्री के स्तन मांस पिण्ड रूप ही है लेकिन कवियों ने उन स्तनों को सुवर्ण के कलश की तरह सुन्दर बतला दिया और उसके मुख में कफ भरा हुआ है फिर भी चन्द्रमा की उपमा दे डाली और उसकी जंघा मूत्र के झरने के कारण क्लिन्न रहती है । फिर भी हाथी के सूंड से उसकी तुलना की है । आश्चर्य है कि उसका शरीर सर्वथा निन्द्य है फिर भी कवियों ने उसके शरीर को उपमा दे देकर महान् बना दिया वह सर्वथा अनुचित है ।
*नारी पीवै पुरुष को, पुरुष नारी को खाइ ।* 
*दादू गुरु के ज्ञान बिन, दोनों गये विलाइ ॥१७२॥* 
नारी मानव का पुरुषत्व नष्ट करके संसार के बन्धन में उसको पटक देती है और पुरुष नारी को स्ववश में करके अमर्यादित भोगों के द्वारा परमार्थ मार्ग से गिरा देता है । अतः विवेक वैराग्यवान् गुरु की शरण में जाकर पतन से अपने आपकी रक्षा करनी चाहिये । विवेकचूड़ामणि में- जो मूढ मानव इन विषयों में, जो दुर्जेय माने गये हैं, उनमें अनुराग से बंधा हुआ ऊपर नीचे के लोकों में अपने कर्मफल भोगने के लिये आते जाते रहते हैं । 
ये विषय काले सांप के विष से भी अधिक विषैले हैं । क्योंकि विष तो खाने वाले को ही मारता है परन्तु ये विषय तो आखों से देखने मात्र से ही मानव को मार देता है । जो विषयों की आशा रूपी पाश से मुक्त हो गया है वह ही मुक्त माना गया है । अन्यथा तो चाहे छओं शास्त्रों का ज्ञाता भी क्यूं न हो विषयों की आशा के रहते हुए मुक्त नहीं हो सकता । 
इति माया का अंग समाप्त ॥अंग १२॥साखी १७५॥
(क्रमशः)

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