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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २२९/२३२*
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(अबहूं)प्रांण तजौं तुम कारणैं, अति आतुर जिय प्यास ।
क्रिपा करौ तो अब मिलौं, सु कहि जगजीवनदास ॥२२९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अब हृदय में व्याकुलता बढ गयी है जीवात्मा अब दर्शन के कारण प्राण त्यागने को है। हे प्रभु अब तो ऐसी कृपा करें कि हम आपसे मिलें, ऐसा संत कहते हैं।
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बिरहापन उर मंहि बसै, ग्यांन गारुडी जोइ ।
कहि जगजीवन नां जीवै, कोटि करै जे कोइ ॥२३०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हृदय में परमात्मा का विरह है। वहां ज्ञान का दीपक कैसै रहेगा। जीव को मोक्ष नहीं दर्शन चाहिए अब कोइ ज्ञान द्वारा करोड़ यत्न करे पर जीवात्मा को तो प्रभु ही चाहिए।
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बिरह प्रेम बिन बंदगी, भगति भाव बिन नांम ।
कहे जगजीवन लौन बिन, बहु व्यंजन२ किहिं कांम ॥२३१॥
(२. व्यंजन-खाद्य पदार्थ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरह व प्रेम के बिना प्रभु प्रार्थना, बिना स्मरण के भक्ति वैसे ही बेस्वाद या आनंद रहित है जैसे बिना नमक के व्यजंन हो।
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अड़सठ तीरथ३ स्थापना, देव देहुरा बेद ।
कहि जगजीवन दरदबंद, रांम कहैं घरि भेद ॥२३२॥
{३. अड़सठ तीरथ- ‘तीर्थ’ उस सरोवर, कुण्ड, प्राकृतिक स्त्रोत, नदी या समुद्र के पवित्र जलसमूह को कहते हैं जहाँ स्नान करने से मनुष्य के पाप कर्म धुल जाते हैं- ऐसी समस्त धर्मश्रद्धालु जनता की मान्यता है ।
सन्त परम्परा ऐसे तीर्थों की संख्या ६८(अड़सठ) मानती है । इन में-बदरीनाथ, केदारनाथ आदि चार धाम; हरद्वार; प्रयाग आदि चार कुम्भ पर्व; गंगा, यमुना, सरस्वती, सरयू, नर्मदा, गोमती एवं ताप्ती सात पवित्र नदियां; सोमनाथ, विश्वनाथ, महाकाल, वैद्यनाथ आदि बारह ज्योतिर्लिंग, काली आदि दश महाविद्याओं के तथा दुर्गा आदि ९ देवियों के मन्दिर, हिमालय तथा विन्ध्याचल आदि पर्वतों तथा उनकी तलहटियों में स्थित मन्दिर; नाथपन्थियों, कबीरपन्थियों तथा अन्य पन्थाई साधुओं के समस्त भारत में फैले अनेक पूजास्थल-इन सब को अड़सठ तीर्थों में सन्तों ने मान्यता दी है ।
इन में १.नराणा, २.भैराणा, ३.करडाला, ४.सांभर, एवं ५.आमेर- इन पाँच स्थानों को भी दादूपन्थी सन्त परम्परा ‘तीर्थ’ मानती हुई उक्त ६८ तीर्थों में इन पाँच स्थानों की पूजा करना अपना प्रथम कर्तव्य मानती है।}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि भारत वर्ष के अड़सठ प्रख्यात तीर्थ व सभी देव व देव मंदिर, वेद, इनसे कहा जाता है कि पाप कट जाते हैं। किंतु विरहीजन ने विरह पीड़ा में यह अनुभव किया है कि राम नाम कहने से ही पाप कट जाते हैं।
(क्रमशः)

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