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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
*दादू दया जिन्हों के दिल नहिं, बहुरि कहावें साध ।*
*जे मुख उनका देखिये, तो लागै बहु अपराध ॥२॥*
जो सब प्राणियों पर दया करते हैं, वे ही साधु कहलाते हैं और जिन के हृदय में दया नहीं और फिर भी साधु कहलाते हैं, ऐसे पुरुषों के मुख देखने में भी पाप लगता है ।
महाभारत में लिखा है कि- हे युधिष्ठर, जो सब प्राणियों पर दया करते हैं । उन दयावान् पुरुषों को कहीं भी भय नहीं होता । दया ही सब से बड़ा तप है । उन दयालु पुरुषों को यह लोक तथा परलोक प्राप्त होते हैं । अतः अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है, ऐसा धर्मवेत्ताओं का मत हैं ।
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*दादू महर मोहब्बत मन नहीं, दिल के वज्र कठोर ।*
*काले काफिर ते कहिये, मोमिन मालिक और ॥३॥*
जिनके मनों में सब भूतों पर दया तथा प्रेम नहीं और हृदय भी ब्रज के समान कठोर है, वे मलिन और नास्तिक होते हैं । जो धर्मात्मा दयालु होते हैं, वे तो इनसे भिन्न ही होते हैं । सबके रक्षक होते हैं ।
लिखा है कि- जो दयालु पुरुष सब प्राणियों को अभयदान देता हैं । उसको सभी प्राणी अभयदान दे देते अर्थात् उसको किसी से भी भय नहीं होता ।
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*दादू कोई काहू जीव की, करै आत्माघात ।*
*साच कहूँ संशय नहीं, सो प्राणी दोज़ख जात ॥४॥*
जो प्राणियों की हत्या करता है, वह अवश्य नरक में जाता है । यह मेरा वचन सत्य जानो, इसमें कोई संदेह नहीं है ।
महाभारत में- जो प्रतिवर्ष सो वर्ष तक अश्वमेघ यज्ञ करता है तथा जो किसी का भी मांस नहीं खाता, इन दोनों को समान ही पुण्य मिलता है ।
असुरों की नाना प्रकार की योनियाँ तथा नरकरूप लोक है । वे सभी अज्ञान तथा दुःख क्लेश तथा महान् अन्धकार से आच्छादित है । जो कोई भी आत्मा की हत्या करने वाले मनुष्य हैं, वे मरकर उन्हीं भयंकर लोकों में बार बार जाते हैं ।
(क्रमशः)

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