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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २३३/२३६*
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मीठा बिरहा क्यौं तजै, बिरही जन जे होइ ।
जगजीवन पिव मिलन कूँ, तन मन त्यागै सोइ ॥२३३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह विरह बड़ा मीठा है। यह त्याज्य नहीं है, अगर कोइ विरही है तो वह ही इसे जानेगा वह ही परमात्मा से मिलने को आतुर तन मन सब त्यागने को तत्पर होगा।
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जगजीवन आया ह्रिदै, इस्क अलह का नूर ।
रूप गह्या रस पीवतां, तो हरिजी किति दूर ॥२३४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हृदय में अल्लाह से ईश्क होने से ही उनके तेज को देखा। उनके दर्शन देख कर ही आनंद का अनुभव हुआ तो अब प्रभु से मिलन भी दुष्कर नहीं है।
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जगजीवन विरही करै, हरि सौं तहां पुकार ।
प्रेम पिवै जहँ आतमा, मगन रहै गहि सार ॥२३५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरही प्रभु को वहां पुकारते है जहाँ से आत्मा प्रेम रुपी आनंद का पान करती है, और वह सार तत्व जैसे दूध का सार तत्व घी होता है को प्राप्त करता है।
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जगजीवन एही दरद, ए ही मिथ्या सरीर ।
बिरही तलफै मीन ज्यूँ, ज्यूँ प्राण तजै बिन नीर ॥२३६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह ही पीड़ा है ये ही मिथ्या देह है और विरहणी प्रभु के बिना ऐसे तड़फती है जैसे बिना जल के मछली।
(क्रमशः)

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