रविवार, 3 मई 2020

= २६२ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग भाँणमली(भवानी) १४, (गायन समय मध्य रात्रि, राम मँजरी मतानुसार)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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२६२. (गुजराती) जलद त्रिताल
ते हरि मलूं मारो नाथ !
जोवा ने मारो तन तपे, 
केवी१ पेरें२ पामूं३ साथ ॥टेक॥
ते कारण हूँ आकुल व्याकुल, 
ऊभी करूं विलाप ।
स्वामी मारो नैणें निरखूं, 
ते तणों४ मनें ताप ॥१॥
एक वार घर आवे वाहला, 
नव५ मेलूं कर हाथ ।
ये वीनती सांभल स्वामी, 
दादू तारो दास ॥२॥
उन मेरे नाथ हरि से मैं मिलूंगी, उनको देखने के लिए मेरा शरीर वियोग-ताप से ताप रहा है । मैं उनका साथ किस१ तरह२ प्राप्त३ कर सकूंगी ... 
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मैं उनके लिए घबरा कर व्याकुल हो रही हूँ और खडी-खडी विलाप करती हूँ । अपने स्वामी को नेत्रों से देखूंगी । उनको४ न देखने कारण ही मुझे दुःख है ...
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यदि एक बार प्रीयतम घर आजायें, तब तो मैं अपने हाथ से उनका हाथ नहीं५ छोडूंगी । हे स्वामिन ! मेरी यह विनय सुनो, मैं आपकी दासी हूँ ।
(क्रमशः)

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