🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भाँणमली(भवानी) १४, (गायन समय मध्य रात्रि, राम मँजरी मतानुसार)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
२६२. (गुजराती) जलद त्रिताल
ते हरि मलूं मारो नाथ !
जोवा ने मारो तन तपे,
केवी१ पेरें२ पामूं३ साथ ॥टेक॥
ते कारण हूँ आकुल व्याकुल,
ऊभी करूं विलाप ।
स्वामी मारो नैणें निरखूं,
ते तणों४ मनें ताप ॥१॥
एक वार घर आवे वाहला,
नव५ मेलूं कर हाथ ।
ये वीनती सांभल स्वामी,
दादू तारो दास ॥२॥
उन मेरे नाथ हरि से मैं मिलूंगी, उनको देखने के लिए मेरा शरीर वियोग-ताप से ताप रहा है । मैं उनका साथ किस१ तरह२ प्राप्त३ कर सकूंगी ...
.
मैं उनके लिए घबरा कर व्याकुल हो रही हूँ और खडी-खडी विलाप करती हूँ । अपने स्वामी को नेत्रों से देखूंगी । उनको४ न देखने कारण ही मुझे दुःख है ...
.
यदि एक बार प्रीयतम घर आजायें, तब तो मैं अपने हाथ से उनका हाथ नहीं५ छोडूंगी । हे स्वामिन ! मेरी यह विनय सुनो, मैं आपकी दासी हूँ ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें