रविवार, 3 मई 2020

= *संयम कसौटी का अंग ११६(३३/३६)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*पीसे ऊपर पीसिये, छांणे ऊपर छांण ।*
*तो आत्म कण ऊबरै, दादू ऐसी जाण ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*संयम कसौटी का अंग ११६*
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कमला१ कंत२ रु केतकी, कंटक कमल सु बास ।
आदम३ अलि४ आवै तहां, तज ब५ शीश की आश ॥३३॥
केतकी और कमल में सुन्दर सुगंध होती है किन्तु साथ ही काँटे भी होते हैं, भंवरा४ उन पर जाता है तब अपने शिर की आशा छोड़ करके ही जाता है । वैसे ही माया१ के स्वामी२ भगवान् के पास भी मनुष्य३ अपने अहंकार रूप शिर की आशा छोड़ता है तब५ ही जाता है ।
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मकर सीप मैमंत१ शिर, मुश्किल मुक्ता२ लेत ।
त्यों रज्जब माया ब्रह्म, दुख दर्शन सो देत ॥३४॥
मगर, सीप और हाथी१ के शिर में मोती२ होते हैं किन्तु कठिनता से मिलते हैं । माया व्यापाराधि कष्ट से मिलती है । वैसे ही अपना निज स्वरूप जो ब्रह्म है वह भी साधना कष्ट सहन करने पर ही दर्शन देते हैं ।
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अरिल - 
मुख सुख माँहि न मार, अंग१ दिखलाव हीं ।
चाकी उर गुरु पैठि सु, आप पिसाव हीं ॥
मैदा मन हि छनाय, विविध व्है व्यंजना२ ।
परिहां रज्जब राम रसोई, मुनि मन रंजना३ ॥३५॥
मुख से कथन करने से सुख में तो कष्ट नहीं है, केवल लक्षण१ बता दिये जाते हैं । किन्तु जैसे गेहूं चक्की में प्रवेश करके अपने को पिसा डालता है फिर मैदा छानकर उसके विविध प्रकार के व्यंजन२ बनते हैं । वैसे ही जो गुरु के हृदयस्थ विचारों में प्रवेश करके अपने अहंकार नष्ट कर देता है फिर मन को सत्यासत्य के विवेक द्वारा छान करके नाना शुद्ध विचार रूप व्यंजन बनते हैं, यही मुनियों के मन को प्रसन्न३ करने वाली रसोई राम के योग्य है ।
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महर१ मारि मंदिर रहै, सुख समूह दुख द्वार ।
कृपा कसौटी के परै, ता२ में फेर न सार ॥३६॥
इन्द्रियों पर दया१ करना रूप वृत्ति को मार के सयंम कष्ट रूप मंदिर में रहना चाहिये, सयंम पालन रूप दु:ख द्वारा ही सुख का समूह प्राप्त होता है । वास्तविक ब्रह्मानन्द तो कृपा और सयंम कष्ट दोनों से ही परे है, सार रूप है, उस२में परिवर्तन नहीं होता ।
(क्रमशः)

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