शुक्रवार, 29 मई 2020

*१५२. गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे*


🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*मेरा संसा को नहीं, जीवण मरण का राम ।*
*सुपिनैं ही जनि बीसरै, मुख हिरदै हरि नाम ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
========================
साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
.
*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
.
*१५२. गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे*
.
भवानन्द जी के सगे-सम्बन्धी और स्नेही प्रभु से भाँति-भाँति की अनुनय-विनय करने लगे। प्रभु ने कहा- ‘भाई ! मैं तो भिक्षुक हूँ, यदि मेरे पास दो लाख रुपये होते तो देकर उसे छुड़ा लाता, किन्तु मेरे पास तो दो कौड़ी भी नहीं। मैं उसे छुड़ाऊँ कैसे? तुम लोग जगन्नाथ जी से जाकर प्रार्थना करो, वे दीनानाथ हैं, सबकी प्रार्थना पर अवश्य ही ध्यान देंगे।’
.
इतने में ही बहुत से पुरुष प्रभु के समीप और भागते हुए आये। उन्होंने संवाद किया कि- ‘भवानन्द, वाणीनाथ आदि सभी परिवार के लोगों को राजकर्मचारी बाँधकर लिये जा रहे हैं।’ सभी लोगों को आश्चर्य हुआ। भवानन्द जी के बन्धन का समाचार सुनकर तो प्रभु के सभी विरक्त और अंतरंग भक्त तिलमिला उठे।
.
स्वरूप दामोदर जी ने अधीरता के साथ कहा- ‘प्रभु ! भवानन्द तो सपरिवार आपके चरणों के सेवक हैं। उनको इतना दुःख क्यों? आपके कृपापात्र होते हुए भी वे वृद्धावस्था में इतना क्लेश सहें, यह उचित प्रतीत नहीं होता। इससे आपकी भक्त वत्सलता की निन्दा होगी।’
.
महाप्रभु ने प्रेम युक्त रोष के स्वर में कहा- ‘स्वरूप ! तुम इतने समझदार होकर भी ऐसी बच्चों की सी बातें कर रहे हो? तुम्हारी इच्छा है कि मैं राजदरबार में जाकर भवानन्द के लिये राजा से प्रार्थना करूँ कि वे इन्हें मुक्त कर दें? अच्छा, मान लो मैं जाऊँ भी और कहूँ भी और राजा ने कह दिया कि आप ही दो लाख रुपये दे जाइये तब मैं क्या उत्तर दूँगा? राजदरबार में साधु ब्राह्मणों को तो कोई घास फूस की तरह भी नहीं पूछता।’
.
स्वरूपगोस्वामी ने कहा- ‘आपसे राजदरबार में जाने के लिये कहता ही कौन है? आप तो अपनी इच्छा मात्र से ही इस विश्व ब्रह्माण्ड को उलट-पुलट कर सकते हैं। फिर भवानन्द को सपरिवार इस दुःख से बचाना तो साधारण-सी बात है। आपको बचाना ही पड़ेगा, न बचावें तो आपकी भक्त वत्सलता ही झूठी हो जायगी, वह झूठी है नहीं। भवानन्द आपके भक्त हैं और आप भक्तवत्सल हैं, इस बात में किसी को सन्देह ही नहीं।’
.
राजदरबार में चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है। सभी के मुखों पर गोपीनाथ के चाँग पर चढ़ने की बात थी। सभी इस असम्भव और अद्भुत घटना के कारण भयभीत-से प्रतीत होते थे। समाचार पाकर महाराज के प्रधान मन्त्री चन्दनेश्वर महापात्र महाराज के समीप पहुँचे और अत्यन्त ही विस्मय प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘श्रीमन ! यह आपने कैसी आज्ञा दे दी ?
.
भवानन्द के पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक तो आपके भाई के समान हैं। उन्हें आप प्राणदण्ड दिला रहे हैं, सो भी दो लाख रुपयों के ऊपर? वे यदि देने से इन्कार करें तो भी वैसा करना उचित था? किन्तु वे तो देने को तैयार हैं। उनके घोड़े आदि उचित मूल्य पर ले लिये जायँ, जो शेष रहेगा, उसे वे धीरे धीरे देते रहेंगे।’
.
महाराज की स्वयं की इच्छा नहीं थी। महामन्त्री की बात सुनकर उन्होंने कहा- ‘अच्छी बात है। मुझे इस बात का क्या पता? यदि वे रुपये देना चाहते हैं, तो उन्हें छोड़ दो। मुझे तो रुपयों से काम है उनके प्राण लेने से मुझे क्या लाभ?’ महाराज की ऐसी आज्ञा मिलते ही उन्होंने दरबार मे जाकर गोपीनाथ जी को सपरिवार मुक्त करने की आज्ञा लोंगों को सुना दी।
.
इस आज्ञा को सुनते ही लोगों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। क्षणभर में बहुत से मनुष्य इस सुखद संवाद को सुनाने के निमित्त प्रभु के पास पहुँचे और सभी एक स्वर में कहने लगे- ‘प्रभु ने गोपीनाथ को चाँग से उतरवा दिया।’ प्रभु ने कहा- ‘यह सब उनके पिता की भक्ति का ही फल है। जगन्नाथ जी ने ही उन्हें इस विपत्ति से बचाया है।’
.
लोगों ने कहा- ‘भवानन्द जी तो आपको ही सर्वस्व समझते हैं और वे ही कह भी रहे हैं कि महाप्रभु की ही कृपा से हम इस विपत्ति से बच सके हैं।’ प्रभु ने लोगों से पूछा- ‘चाँग के समीप खड़े हुए भवानन्द जी का उस समय क्या हाल था?’
.
लोगों ने कहा- ‘प्रभो ! उनकी बात कुछ न पूछिये। अपने पुत्र को चाँग पर चढ़े देखकर भी न उन्हें हर्ष था न विषाद। वे आनन्द के सहित प्रेम में गद्गद होकर-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ - इस मन्त्र का जप कर रहे थे। दोनों हाथों की उँगलियों के पोरों से वे इस मन्त्र की संख्या को गिनते जाते थे। उन्हें आपके ऊपर दृढ़ विश्वास था।’
.
प्रभु ने कहा- ‘सब पुरुषोत्तम भगवान की कृपा है। उनकी भगवत-भक्ति का ही फल है कि इतनी भयंकर विपत्ति से सहज में ही छुटकारा मिल गया, नहीं तो राजाओं का क्रोध कभी निष्फल नहीं जाता।’ इतने में ही भवानन्द जी अपने पाँचों पुत्रों को साथ लिये हुए प्रभु के दर्शनों के लिये आ पहुँचे। उन्होंने पुत्रों के सहित प्रभु के पापद्मों में साष्टांग प्रणाम किया अैर गद्गद कण्ठ से दीनता के साथ वे कहने लगे- ‘हे दयालो ! हे भक्तवत्सल !! आपने ही हमारा इस भयंकर विपत्ति से उद्धार किया है। प्रभो ! आपकी असीम कृपा के बिना ऐसा असम्भव कार्य कभी नहीं हो सकता कि चाँग पर चढ़ा हुआ मनुष्य फिर जीवित ही उतर आवे !'
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें