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*जीवों माँही जीव रहै, ऐसा माया मोह ।*
*सांई सूधा सब गया, दादू नहीं अंदोह ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१५२. गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे*
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राजपुत्र ने कुछ रोष के साथ कहा- ‘तुम क्या चाहते हो, दो लाख रुपये इन घोड़ों में ही बेबाक कर दें? जितने के होंगे उतने ही तो लगावेंगे।’ गोपीनाथ ने अपने रोष को रोकते हुए कहा- ‘श्रीमान ! घोड़े बहुत बढि़या नस्ल के हैं। इनता मूल्य तो इनके लिये बहुत ही कम है।’
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इस बात पर कुपित होकर राजपुत्र ने कहा- ‘दुनिया भर के रद्दी घोड़े इकट्ठे कर रखे हैं और चाहते हैं इन्हें ही देकर दो लाख रूपयों से बेबाक हो जायँ। यह नहीं होने का। घोड़े जितने के होंगे, उतने के ही लगाये जायँगे।’ राजप्रसाद प्राप्त मानी गोपीनाथ अपने इस अपमान को सहन नहीं कर सके।
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उन्होंने राजपुत्र की उपेक्षा करते हुए धीरे से व्यंग्य के स्वर में कहा- ‘कम से कम मेरे ये घोड़े तुम्हारी तरह ऊपर मुँह उठाकर इधर उधर तो नहीं देखते।’ उनका भाव था कि तुम्हारी अपेक्षा घोड़ों का मूल्य अधिक है। आत्मसम्मानी राजपुत्र इस अपमान को सहन नहीं कर सका। वह क्रोध के कारण जलने लगा। उस समय तो उसने कुछ नहीं कहा।
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उसने सोचा कि यहाँ हम कुछ कहें तो बात बढ़ जाय और महाराज न जाने उसका क्या अर्थ लगावें। शासन में अभी हम स्वतन्त्र नहीं हैं, यही सोचकर वह वहाँ से चुपचाप महाराज के पास चला गया। वहाँ जाकर उसने गोपीनाथ की बहुत सी शिकायतें करते हुए कहा- ‘पिताजी ! वह तो महाविषयी है, एक भी पैसा देना नहीं चाहता।
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उलटे उसने मेरा घोर अपमान किया है। उसने मेरे लिये ऐसी बुरी बात कही है, जिसे आपके सामने कहने में मुझे लज्जा आती है। सब लोगों के सामने वह मेरी एक सी निन्दा कर जाय? नौकर होकर उसका ऐसा भारी साहस? यह सब आपकी ही ढील का कारण है। उसे जब तक चाँग पर न चढ़ाया जायेगा तब तक रुपये वसूल नहीं होंगे, आप निश्चय समझिये।’
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महाराज ने सोचा- ‘हमें तो रुपये मिलने चाहिये। सचमुच जब तक उसे भारी भय न दिखाया जायगा, तब तक वह रुपये नहीं देने का। एक बार उसे चाँग पर चढ़ाने की आज्ञा दे दें। सम्भव है इस भय से रुपये दे दे। नहीं तो पीछे उसे अपनी विशेष आज्ञा से छोड़ देंगे। भवानन्द के पुत्र को भला हम दो लाख रुपयों के पीछे चाँग पर थोड़े ही चढ़वा सकते हैं।
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अभी कह दें, इससे राजकुमार का क्रोध भी शान्त हो जायगा और रुपये भी सम्भवतया मिल ही जायँगे। यह सोचकर महाराज ने कह दिया- ‘अच्छा भाई, वही काम करो, जिससे उससे रुपये मिलें। चढ़वा दो उसे चाँग पर।’ बस, फिर क्या था। राजपुत्र ने फौरन आज्ञा दी कि गोपीनाथ को यहाँ बाँधकर लाया जाय।
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क्षण भर में उसकी आज्ञा पालन की गयी। गोपीनाथ बाँधकर चाँग के समीप खड़े किये गये। अब पाठकों को चाँग का परिचय दें कि यह चाँग क्या बला है। असल में चाँग एक प्रकार से सूली का ही नाम है। सूली में और चाँग में इतना ही अन्तर है कि सूली गुदा में होकर डाली जाती है और सिर में होकर पार निकाल ली जाती है।
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इससे जल्दी प्राण नहीं निकलते- बहुत देर में तड़प तड़प कर प्राण निकलते हैं। चाँग उससे कुछ सुखकर प्राण नाशक क्रिया है। एक बड़ा सा मंच होता है। उस मंच के नीचे भाग में तीक्ष्ण धार वाला एक बहुत बड़ा खड्ग लगा रहता है। उस मंच पर से अपराधी को इस ढंग से फेंकते हैं कि जिससे उस पर गिरते ही उसके प्राणों का अन्त हो जाये।
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इसी का नाम ‘चाँग चढ़ाना’ है। बड़े बड़े अपराधियों को ही चाँग पर चढ़ाया जाता है। ‘गोपीनाथ पट्टनायक चाँग पर चढ़ाये जायँगे’ -इस बात का हल्ला चारों ओर फैल गया। सभी लोगों को इस बात से महान आश्चर्य हुआ। महाराज जिन राजा भवानन्द को अपने पिता के समान मानते थे, उनके पुत्र को वे चाँग पर चढ़ा देंगे, सचमुच इन राजाओं के चित्त की बात समझी नहीं जाती, ये क्षण भर में प्रसन्न हो सकते हैं और पल भर में क्रुद्ध। इनका कोई अपना नहीं।
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ये सब कुछ कर सकते हैं। इस प्रकार भाँति-भाँति की बातें कहते हुए सैंकड़ों पुरुष महाप्रभु के शरणापन्न हुए और सभी हाल सुनाकर प्रभु से उनके अपराध क्षमा करा देने की प्रार्थना करने लगे। प्रभु ने कहा- ‘भाई ! मैं कर ही क्या सकता हूँ, राजा की आज्ञा को टाल ही कौन सकता है? ठीक ही है, विषयी लोगों को ऐसा ही दण्ड मिलना चाहिये। जब वह राजद्रव्य को भी अपने विषय-भोग में उड़ा देता है तो राजा को उससे क्या लाभ? दो लाख रुपये कुछ कम तो होते ही नहीं। जैसा उसने किया, उसका फल भोगा। मैं क्या करूँ?’
(क्रमशः)

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