सोमवार, 4 मई 2020

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*दादू पलक मांहि प्रकटै सही, जे जन करैं पुकार ।*
*दीन दुखी तब देखकर, अति आतुर तिहिं बार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भ्रातृ भक्ति*
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एक छोटे गांव में एक दरिद्र विधवा ब्राह्मणी थी । उसके मोहन नाम का एक ही बालक था । भिक्षा से निर्वाह करती थी । मोहन छ: वर्ष का हुआ तब उसने गांव से दो कोस(छ: किलोमीटर) एक पाठशाला के अध्यापक से अपने बालक को पढाने की प्रार्थना की । अध्यापक ने स्वीकार कर लिया । मोहन जब पढकर सांयकाल आता तब अंधेरा होने से उसे डर लगता था ।
उसनें माँ से कहा - "दूसरे लड़कों को नोकर ले जाते हैं, तू मेरे लिये भी एक नौकर रख दो ।"
यह सुनकर माँ बोली - बेटा ! अपने गोपाल को छोड़ कर और कोई नहीं है ।"
मोहन - "गोपाल मेरा क्या लगता है ?"
माता - "बड़ा भाई ।"
मोहन - "कहाँ रहता है ।"
माता - "सब जगह रहता है और व्याकुल होकर पुकारने से झट आ जाता है ।" मोहन - "जब मुझे डर लगता है तब व्याकुल तो मैं हो ही जाता हूँ, पुकारूंगा गोपाल भाई आ जायेंगे ।"
दूसरे दिन आते समय डर लगते ही उसने पुकारा - "गोपाल भाई ! तुम शीघ्र आओ मुझे डर लग है ।"
तुरंत ही उसे सुनाई पड़ा - "भैया ! तू डर मत मैं आ गया ।"
गोपाल आये और मोहन का हाथ पकड़ कर बातें करते हुये वन की सीमा तक उसे पहुंचाकर लौट आये । प्रतिदिन ऐसा ही होने लगा । इससे सूचित होता है कि भ्रातृ भाव के भक्त की सहायता भगवान अवश्य ही करते हैं ।
भ्रातृ भाव के भक्त की, हरि करते सु सहाय ।
अभय किया गोपाल ने, मोहन को वन आय ॥२७५॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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