सोमवार, 4 मई 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग भाँणमली(भवानी) १४, (गायन समय मध्य रात्रि, राम मँजरी मतानुसार)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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२६३. रंगताल
ते केम१ पामिये२ रे, दुर्लभ जे आधार ।
ते बिना तारण को नहीं, केम उतरिये पार ॥टेक॥
केवी३ पेरें४ कीजे आपणो रे, तत्व ते छे सार ।
मन मनोरथ पूरे मारा, तन नो ताप निवार ॥१॥
संभार्यो आवे रे वाहला, वेला५ ये अवार६ ।
विरहणी विलाप करे, तेम७ दादू मन विचार ॥२॥
इति राग भांणमली(भवानी) सम्पूर्णः ॥१४॥पद ४॥
जो हमारे आधार हैं, वे प्रभु तो दुर्लभ हो रहे हैं, उनको कैसे१ प्राप्त कर सकेंगे ? उनके बिना संसार से तारने वाला कोई भी नहीं है । फिर हम कैसे पार उतर सकेंगे ? 
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जो संसार का सार तत्व है उसे किस३ तरह४ अपना बना सकेंगे ? हे प्रियतम ! मेरे मन का मनोरथ पूर्ण करके शरीर की ताप दूर करो । 
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प्रियतम ! भक्तों के स्मरण करने पर तो आप शीघ्र आते हैं, फिर इस समय५ देर६ क्यों कर रहे हैं ? मैं विरहनी विलाप कर रही हूँ, इसे७ मन में विचार कर के शीघ्र ही पधारिये ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका राग भांणमली(भवानी) समाप्त: ॥१४॥
(क्रमशः)

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