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*रूख वृक्ष वनराइ सब, चंदन पासैं होइ ।*
*दादू बास लगाइ कर, किये सुगन्धे सोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४३. स्वामी प्रकाशानन्द जी मन से भक्त बने*
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अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्या:
स्वानन्दसिंहासनलब्धदीक्षा:।
हठेन केनापि वयं शठेन
दासीकृता गोपवधूविटेन॥[१]
([१] अद्वैत मार्ग के पथिकों द्वारा उपास्य और आत्मानन्दसिंहासन पर दीक्षा पाये हुये गोपरमणियों के किसी कुटिल कामुक ने हठात् अपना दास बना लिया। श्रीकृष्णकर्णामृत)
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श्री पाद प्रकाशानन्द जी के नाम से पाठक पूर्व ही परिचित होंगे। इनकी जन्म भूमि तैलंग देश में थी। दक्षिण देश की यात्रा के समय श्री रंग क्षेत्र के समीप बलगण्डी नामक ग्राम में महाप्रभु नें वेंकट भटृ के यहाँ चातुर्मास व्यतीत किया था। वेंकट भट्ट श्री वैष्णव सम्प्रदाय के वैष्णव थे। उनके भक्ति-भाव से प्रसन्न होकर प्रभु ने उनके घर चार मास निवास किया।
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उन्हीं के पुत्र श्री गोपाल भट्ट प्रभु की बड़ी भारी सेवा की थी और पिता के परलोकगमन के अनन्तर ये प्रभु के आज्ञानुसार घर-बार छोड़कर वृन्दावन वास करने चले गये थे और वहीं अन्त तक श्री राधारमण जी की सेवा-पूजा में लगे रहे। श्री गोपाल भट्ट जी के पिता तीन भाई थे। सबसे बडे तो इनके पिता श्री वेंकट भट्ट, मध्यम त्रिमल्ल भट्ट और छोटे ये ही श्री पाद प्रकाशानन्द जी महाराज थे।
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संन्यास के पूर्व इनका घर का नाम क्या था, इसका पता अभी तक नहीं चला। ये संन्यासी हो जाने पर भी अपने भतीजे गोपाल भट्ट से अत्यधिक स्नेह रखते थे। ये जानते थे कि गोपाल एक होनहार युवक है, कालान्तर में यह जगत्प्रसिद्ध पण्डित़ बन सकेगा, किन्तु जब उन्होंने सुनाओ कि एक बंगाली युवक साधु के संसर्ग से गोपाल शास्त्रों का पठन-पाठन छोड़कर 'कृष्ण-कृष्ण' रटने लगा हैं, तब उन्हें कुछ मानसिक दु:ख भी हुआ ओर उनकी इच्छा उस युवक संन्यासी से शस्त्रार्थ करने की हुई?
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प्रेम का आकर्षण कई प्रकार से होता है। कभी तो किसी की प्रशंसा सुनकर मन-ही-मन डाह होता है और उसके प्रति मन में एक स्वाभाविक-सा स्नेह उत्पन्न हो जाता है। जिसके गुणों से हम डाह करते हैं उसी के प्रति हृदय में अपने-आप ही प्रेम उत्पन्न हो रहा है, इससे घबड़ाकर हम उस व्यक्ति की खुल्लमखुल्ला निंदा करने लगते हैं। इसमें हम अपनी स्वाभाविक वृत्ति को दबाना चाहते है, किंतु ऐसा करने से वह और भी अधिक उभरती हैं।
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द्वेषाभाव से ही सही, चित्त उससे मिलने के लिए के सदा व्याकुल-सा बना रहा है और उसका प्रसंग और उसका प्रसंग आने पर रागवश उसके लिये दो-चार कडवे शब्द अपने-आप ही मुंह से निकल पडते हैं। प्रकाशानन्द जी का प्रभु के प्रति ऐसा ही अनुराग हो गया था।
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जब उन्होंने सुना कि जिस संन्सासी ने हमारे भ्रातृपुत्र गोपाल को बहकाया है, उसी ने सार्वभौम भट्टाचार्य-जैसे परम विद्वान पण्डित को अपने वश में कर रखा है और वे उसे अवतार समझते हैं, इससे उनकी जिज्ञासा और बढ गयी। उसी जिज्ञासा के फलस्वरूप उन्होंने प्रभु के पास व्यंग्यपूर्ण पत्र भेजे थे, जिन्हें पाठक प्रथम ही पढ़ चुके होंगे।
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अब जब उन्होंने सुना कि वही युवक संन्सासी यहाँ काशी मे आया है, तब तो वे किसी प्रकार प्रभु से भेंट करने की बात सोचने लगे। किन्तु भेंट हो कैसे? प्रकाशानन्द जी काशी के प्रतिष्ठित पण्डित और सम्माननीय संन्यासी थे। ये वहाँ के मठधारी संन्यासियों में सर्वश्रेष्ठ संन्यासी समझे जाते थे।
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ये किसी अनजान संन्यासी के पास मिलने कैसे जाते? वयोवृद्ध, विद्यावृद्ध, प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित होते तो वे सम्भवतया चले भी जाते, परन्तु महाप्रभु युवक थे, उनकी दृष्टि में वे भारी पण्डित भी नहीं थें, प्रसिद्धि भी उनकी इधर नहीं थीं, उन्होंने हेय सम्प्रदाय के भारती संन्यासी से दीक्षा ली थी, इस कारण अपने को प्रसिद्ध पण्डित और प्रतिष्ठित समझने वाले दण्डी संन्यासी प्रकाशानन्द जी प्रभु के निवास स्थान से प्रकाशानन्द जी का मठ कोई बहुत दूर नहीं था।
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उनका मठ भी बिन्दुमाधव के समीप ही था और प्रभु भी उधर ही तपन मिश्र के यहाँ ठहरे हुए थे। प्रभु ने स्वयं उनके पास जाने की आवश्यकता नहीं समझी, क्योंकि महाप्रभु बड़े ही संकोची थे। बड़ों के सामने बोलने में उन्हें बहुत संकोच होता था। इसलिये उन्होंने सोचा उनके पास जायंगे तो कुछ-न-कुछ वाद-विवाद छिड़ ही जायगा।
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इसलिये वे भी उनके पास नहीं गये और दस-बारह दिन ठहरकर श्री वृन्दावन को चले गये। वृन्दावन से लौटकर प्रभु दो महीनों तक काशी में रहे। इस प्रवास में प्रभु बहुत ही साधारण संन्यासी की तरह रहते थे। वे न तो कहीं बाहर भिक्षा के लिये जाते थे और न संन्यासियों के दर्शनों को जाते। केवल चन्द्रशेखर के घर से गंगा स्नान को और विश्वनाथ जी के दर्शनों को जाते और तपन मिश्र के घर भिक्षा करके वहीं भगवन्नाम-संकीर्तन ओर जप करते रहते।
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इसलिये उनके दो-चार अन्तरंग भक्तों को छोड़कर प्रभु की महिमा किसी पर प्रकट नहीं हुई ! प्रकाशानन्द जी मन-ही-मन सोचते- 'सचमुच यह कोई अजीब ही संन्यासी हैं। हमारे साथ इतना परिचय होने पर भी यह हमारे मठ में नहीं आता है और न संन्यासियों की सभा में सम्मिलित होता है।' अवश्य ही कोई विलक्षण पुरुष है।'
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जो महाराष्ट्रीय ब्राह्मण प्रभु के चरणों में अत्यधिक अनुराग रखते थे, उनका घर श्री प्रकाशानन्द जी के मठ के समीप ही था। वे प्राय: उनके पास जाया-आया करते और उनका यथाशिक्त द्रव्यादि से सेवा-सुश्रूषा भी किया करते। जब-जब महाप्रभु का प्रसंग छिड़ता तब-तब प्रकाशानन्द जी प्रभु के ऊपर कटाक्ष करते और उनके निन्दा सूचक शब्दों का प्रयोग भी कर बैठते।
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वैसे उनका हृदय सरस था। कवि-प्रकृति के थे। भावुक थे। मिलनसार थे, प्रणय के ऐकान्तिक उपासक थे; किन्तु अभी तक उनकी भावुकता को अद्वैत वेदान्त की प्रखर युक्तियों ने प्रच्छन्न कर रखा था। अभी तक उनकी सरसता और प्रणयोत्सुकता प्रस्फटित नहीं हुई थी। प्राय: देखा गया है कि ऐसे भारी विद्वानों की भावुकता किसी परम भावुक महापुरुष के संसर्ग से ही एकदम विकसित हो जाती है।
(क्रमशः)

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