सोमवार, 18 मई 2020

*१४३. स्‍वामी प्रकाशानन्‍द जी मन से भक्‍त बने*


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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*अंत अधार संत सुधार, सुन्दर सुखदाई ।*
*काम क्रोध काल ग्रसत, प्रकटो हरि आई ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ४२६)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४३. स्‍वामी प्रकाशानन्‍द जी मन से भक्‍त बने*
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ईसा के प्रधान शिष्‍य सेण्‍ट पाल पहले शुष्‍क और नास्तिक थे, जब उन्‍होंने ईसा को शूल पर हंसते हुये चढ़ते देखा तब उनकी भावुकता एकदम फूट पड़ी और वे ही पीछे से ईसाई धर्म के सर्वश्रेष्‍ठ प्रचारक हुए। स्‍वामी विवेकानन्‍द पहले नास्तिक प्रकृति के घोर कुतर्की थे, परमहंस रामकृष्‍णदेव के हाथ फेरते ही न जाने उनकी नास्तिकता कहाँ भग गयी और अन्‍त में वे ही भगवान रामकृष्‍णदेव के मिशन को विश्‍वव्‍यापी बनाने वाले प्रधान पुरुष हुए।
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इसी प्रकार स्‍वामी प्रकाशानन्‍द जी की भी ललित वृत्तियाँ श्री चैतन्‍य-चरणों के दर्शन से ही विकसित हुईं। अन्‍त में उन्‍होंने श्रीचैतन्‍य के गुणगान में इतनी सुन्‍दर कविता लिखी जिससे कठोर-से-कठोर भी हृदय द्रवीभूत हो सकता है। इनके बनाये हुए श्री चैतन्‍यचन्‍द्रामृत काव्‍य की जितनी भी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम है। अस्‍तु।
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उस महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन ने एक दिन बातों-ही बातों में स्‍वामी जी से कहा- 'स्‍वामिन ! उन बंगाली वैद्य के यहाँ जो संन्‍यासी ठहरे हुए हैं, उनके चेहरें में कितना भारी आकर्षण हैं। जो एक बार उन्‍हें देख लेता है, वही उनका बन जाता है। उनकी बाणी में अपार करुणा है। भगवद्गुण-गान करते-करते वे मूर्च्छित हो जाते हैं। एक दम तन्‍मय होकर श्रीकृष्‍ण-कथा कहते हैं।'
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प्रकाशानन्‍द जी ने कहा- 'अरे, क्‍या हम उन्‍हें जानते नहीं? खूब जानते हैं। वे कोई आकर्षण-मन्‍त्र जानते हैं, इसी से तो उन्‍होंने सार्वभौम-जैसे विद्वान को बहका लिया; किन्‍तु यहाँ उनकी दाल नहीं गलने की। इस विश्‍वनाथ जी की पुरी में उनकी भक्ति को कोई दो कौड़ी में भी न पूछेगा।
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यहाँ स्त्रियों की तरह नाचने वाले न मिलेंगे। बंगालियों की तरह यहाँ भावुक और भोले-भाले अनपढ़ आदमी नहीं हैं। यहाँ के भंगी-चमार तक ब्रह्मज्ञान बातें जानते हैं। 'इस बात के सुनने से उन महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन को बड़ा दु:ख हुआ। वे सोचने लगे- 'इतने भारी विद्वान और त्‍यागी पुरुषों के हृदय में भी हाड की अग्नि इतनी प्रबल होती है। इतने ज्ञानी होने पर भी लोग दूसरों की प्रशंसा नहीं सुन सकते।
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सचमुच प्रतिष्‍ठा की इच्‍छा बड़ी ही प्रबल होती है। महान पण्डित-से पण्डित भी अपनी प्रतिष्‍ठा-स्‍थापन करने के निमित्त दूसरों की निन्‍दा करने में संकोच नहीं करते। लोकैषणा कितनी प्रबल है !' दूसरे दिन दु:खी चित्त से उस भावुक सज्‍जन ने प्रभु से सभी बातें कहीं और वह करुण स्‍वर में कहने लगा- 'प्रभो ! स्‍वामी जी कहते थे यहाँ उनकी भक्ति कों कोई दो कौड़ी में भी न पूछेगा।'
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प्रभु ने कहा-' हमें दो कौड़ियों से करना ही क्‍या? मुफ्त तो कोई लेगा? हम तो वैसे ही लुटा देंगे ! इस पर भी कोई न लेगा तो फेंककर चले जायँगे। कभी तो कोई उठा ही लेगा।' प्रभु के ऐसे सरल और विद्वेष से रहित उत्तर को सुनकर महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन की श्रद्धा प्रभु के चरणों में और भी अधिक बढ़ गयी और वे सोचने लगे कि 'जब इनकी एक-एक बात का मेरे ऊपर इतना प्रभाव पड़ता हैं, तब यदि प्रकाशानन्‍द जी से इनका साक्षात्‍कार हो जाय तब तो उनका उद्धार ही हो जाय।
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वे मूर्ख नहीं हैं, हठी हैं, सूखी तबीयत के नहीं हैं। प्रभु से बातें करते ही वे पानी-पानी हो जायँगे और सभी निन्‍दा करना भूलकर इनके सेवक बन जायँगे, किन्‍तु भेंट हो तो कैसे हो? वे यहाँ आवेंगे नहीं, प्रभु वहाँ जाने को राजी न होंगे। 'वे सज्‍जन इसी चिन्‍ता में पड़ गये। अपने मनोगत भाव उन्‍होंने तपन मिश्र, चन्‍द्रशेखर तथा और भी दो-चार प्रभु के भक्‍तों के सामने प्रकट किये।
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तपन मिश्र ने कहा- एक युक्ति हो सकती है। कोई सभी संन्‍यासियों का निमन्‍त्रण करे और प्रभु से भी वहाँ चलने का बहुत आग्रह करे, तो प्रभु अपने प्रिय भक्‍त के आग्रह की कभी अवहेलना न करेंगे, अवश्‍य ही चले जायंगे। यह सुनकर उस महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन ने जल्‍दी से कहा- 'इसके लिये मैं स्‍वयं तैयार हूँ। यह कौन-सी बड़ी बात है। किन्‍तु आप प्रभु को ले चलने का जिम्‍मा लें।'
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तपन मिश्र ने कहा-' अजी, हम सभी पैर पकड़ लेंगे, चलेंगे कैसे नहीं। तुम सभी करो।' वे सज्‍जन अच्‍छे धनिक थे। हजार-पांच सौ रूपये खर्च करना उनके लिय कोई कठिन काम नहीं था, फिर ऐसे पुण्‍य कार्य का अवसर तो बड़े सौभाग्‍य से मिलता है। इसलिये उन्‍होंने काशी के सभी मठों के और विरक्त संन्‍यासियों को निमन्त्रित किया। ठीक समय पर सभी संन्‍यासी अपने-अपने साथी और शिष्‍यों के सहित उस सज्‍जन के घर में आ उपस्थित हुए।
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महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन ने सभी के बैठने के लिये गद्दे,‍ तकिये, गलीचे आदि का बड़ा सुन्‍दर प्रबन्‍ध किया था। मठधारी महन्‍त सभी बड़े-बड़े तकियों के सहारे गलीचों पर बैठ गये। उनके इधर-उधर उनके शिष्‍य बैठे हुए वेदान्‍त विष्‍यक बातें करने लगे। कोई 'विवेक-चूड़ामणि' का श्‍लोक बोलता, तो कोई शांकर भाष्‍य की ही पंक्ति को बोल उठता और निर्विशेष ब्रह्म की सिद्धि में अपने सारे पाण्डित्य को खर्च कर देता।
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सबके बीच में श्रेष्‍ठ आसन पर श्रीमत प्रकाशानन्‍द जी सरस्‍वती बैठे थे। उस समय दण्‍ड धारण किये हुए वे देवताओं से घिरे हुए ब्रह्मा जी के समान प्रतीत होते थे अथवा ऐसे मालूम होते थे जैसे नैमिषारण्‍य के पुण्‍य तीर्थ में शौनक जी अपने अट्ठासी हजार शिष्‍यों के मध्‍य में बैठे हुए उनकी शास्‍त्र-चर्चा सुन रहे हों। उसी समय वह महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन प्रभु के समीप पहुँचे। प्रभु के निमन्त्रित तो पहले से ही कर रखा था। अब उन्‍होंने जाकर कहा- 'प्रभो ! सभी महात्‍मा आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं।'
(क्रमशः)

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