बुधवार, 6 मई 2020

*१२०. पुरी में भक्‍तों के साथ आनन्‍द विहार*

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*मन मतवाला राम रंग,*
*मिल आसण बैठे एक संग ।*
*सुस्थिर दादू एकै अंग,*
*प्राणनाथ तहँ परमानन्द ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३७२)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१२०. पुरी में भक्‍तों के साथ आनन्‍द विहार*
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परिवदतु जनो यथा तथा वा
नतु मुखरो न वयं विचारयाम:।
हरिरसमदिरामदातिमत्ता भुवि
विलुठाम नटाम निर्विशाम॥[१]
([१] बकवादी लोग जैसा चाहें वैसा अपवाद किया करें, हम उस पर ध्‍यान नहीं देंगे, हम तो बस हरिनाम-रस की मदिरा के नशे में मस्‍त हो भूमि पर नाचेंगे, लोटेंगे और लोटते-लोटते बेसुध हो जायँगे। चैत. चरि.)
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आनन्‍द और उल्‍लास को विध्‍वंस करने वाली राक्षसी चिन्‍ता ही है। संसार चिन्‍ता का घर है। संसारी लोगों के धन की, मान प्रतिष्‍ठा, स्‍त्री-बच्‍चों की तथा और हजारों प्रकार की चिन्‍ताएँ लगी रहती हैं। उन चिन्‍ताओं के ही कारण उनका आनन्‍द एकदम नष्‍ट हो जाता है और वे सदा अपने को विपद्ग्रस्‍त सा ही अनुभव करते रहते हैं।
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जिन्‍हें संसारी भोगों को संग्रह करने की चिन्‍ता है, उन्‍हें सुख कहाँ? वे बेचारे आनन्‍द का स्‍वाद क्‍या जानें। आनन्‍द की मिठास तो भोगों की इच्‍छाओं से रहित वीतरागी प्रभु प्रेमी ही जान सकते हैं। आनन्‍द भोगों न होकर उनकी हृदय से इच्‍छा न करने में ही है।
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इसीलिये परमार्थ के पथिक विषय-भोगों का परित्‍याग करके पुण्‍य-तीर्थों में या वनों में जाकर निवास करते हैं। संसारी लोगों पर भी इन पुण्‍य स्‍थानों का प्रभाव पड़ता है। किसी धनिक के धर जाकर हम मिलते हैं, तो उसे मान-अपमान, स्‍त्री-पुत्र तथा परिवार के चिन्‍ताजनक वायुमण्‍डल में घिरा हुआ देखते है, वहाँ वह हमसे न तो खूब प्रेमपूर्वक मिलता ही है और न खुलकर बातें ही करता है।
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उसी से जब किसी विरक्‍त साधु महात्‍मा के स्‍थान पर, किसी पवित्र देवस्‍थान अथवा जगन्‍मान्‍य पुण्‍यतीर्थ पर मिलते हैं तो वह बड़ी ही सरलता से मिलता है, हंसता है, खेलता है और बच्‍चों की तरह निष्‍कपट बातें करता है। इसका कारण यह है कि उसके हृदय में आनन्‍द का अंश भी है और चिन्‍ता का भी।
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घर पर चिन्‍ता के परमाणुओं का प्राबल्‍य होने से वह उन्‍हीं के वशीभूत रहता है। आनन्‍द की पवित्र इच्‍छा यदि उसके हृदय में होती ही नहीं, तो वह सदाचारी एकान्‍तप्रिय महात्‍माओं के पास जाने ही क्‍यों लगा?
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उनके पास जाने से प्रतीत होता है कि वह सच्‍चे आनन्‍द का भी उत्‍सुक है और उसके आनन्‍दमय भाव महापुरुष की संगति में ही आकर पूर्णरीत्‍या परिस्‍फुटत होते हैं, इसीलिये तो कहा है सदाचारी और कल्‍याण-मार्ग के जाने वाले सद्गृहस्‍थ को भी सालभर में दो एक महीनों के लिये किसी पवित्र स्‍थान में या किसी महापुरुष के संसर्ग में रहना चाहिये।
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इससे उसे परमार्थ के पथ में बहुत अधिक सहायता मिल सकती है और इन स्‍थानों के सेवन से उसे सच्‍चे आनन्‍द का भी कुछ-कुछ अनुभव हो सकता है। गौड़ीय भक्‍त घर-बार की चिन्‍ता छोड़कर चार महीने प्रभु के चरणों में रहने के लिये आये थे। एक तो वे वैसे ही भगवद्भक्‍त थे, उस पर भी महाप्रभु के परम कृपापात्र थे और संसारी भोगों से एकदम उदासीन थे।
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तभी तो उन्‍हें पुरुषोत्तम जैसे परम पावन पुण्‍यक्षेत्र में प्रेमावतार श्रीचैतन्‍यदेव की संगति में इतने दिनों तक निवास करने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हो सका। महाप्रभु तो आनन्‍द की मूर्ति ही‍ थे, उनकी संगति परम आनन्‍द का अनुभव होना अनिवार्य ही था। इसीलिये चार महीनों तक भक्‍तों को प्रभु के साथ बड़ा ही आनन्‍द रहा। महाप्रभु भी उनके साथ नित्‍य भाँति-भाँति की नयी नयी क्रीडाएँ किया करते थे।
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रथ-यात्रा के पश्‍चात जो पंचमी आती है, उसे ‘हेरापंचमी’ कहते हैं। उस दिन महालक्ष्‍मी भगवान को हेरती अर्थात खोजती हैं। इसीलिये उसका नाम हेरापंचमी है। जगन्‍नाथ जी में हेरापंचमी का उत्‍सव भी खूब धूम धाम से होता है। जिस प्रकार जगन्‍नाथ जी के मन्दिर को नीलाचल कहते हैं। उसी प्रकार गुण्टिचा उद्यान के मन्दिर को सुन्‍दराचल कहते हैं।
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भगवान तो उस दिन सुन्‍दराचल में ही विराजते हैं, किन्‍तु हेरापंचमी का उत्‍सव यहाँ नीलाचल में ही होता है। अबके महाराज ने अपने कुल पुरोहित श्रीकाशी मिश्र को हेरापंचमी उत्‍सव को धूम धाम के साथ करने की आज्ञा दी। महाराज के आज्ञानुसार भगवान का मन्दिर विविध भाँति से सजाया गया।
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महाराज ने स्‍वयं अपने घर का सामान उत्‍सव की सजावट के लिये दिया और महाप्रभु के दर्शन के लिये विशेष रीति से प्रबन्‍ध किया गया। प्रात:काल सभी भक्‍तों को साथ लेकर महाप्रभु हेरापंचमी के लक्ष्‍मी-विजयोत्‍सव को देखने के लिये सुन्‍दराचल से नीलाचल पधारे।
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महाराज ने उनके बैठने का पहले से ही सुन्‍दर प्रबन्‍ध कर रखा था। महाप्रभु अपने सभी भक्‍तों के सहित यहाँ बैठ गये। इतने में ही एक बहुत बढ़िया सुन्‍दर डोला में बैठकर भगवान को खोजती हुई लक्ष्‍मी जी अपनी सभी दासियों के सहित पधारीं। उस समय लक्ष्‍मी जी की शोभा अपूर्व ही थी।
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उनके सम्‍पूर्ण अंगों में भाँति-भाँति के बहुमुल्‍य अलंकार शोभायमान थे, आगे आगे देव दासियाँ नृत्‍य करती आ रही थीं और अनेक प्रकार के वाद्य उनके आगे बज रहे थे। आते ही लक्ष्‍मी जी की दासियों ने जगन्‍नाथ जी के मुख्‍य मुख्‍य सेवकों को बांध लिया और बाँधकर उन्‍हें लक्ष्‍मी जी के सम्‍मुख उपस्थित किया। दासियाँ उन सेवकों को मारती भी जाती थीं। महाप्रभु ने स्‍वरूपदामोदर से पूछा- ‘स्‍वरूप ! यह क्‍या बात है, लक्ष्‍मी जी इतनी कुपित क्‍यों हैं?’
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स्‍वरूपदामोदर ने कहा- ‘प्रभो ! क्रोध की बात है। अपने प्राणप्‍यारे से पृथक होने पर किसे अपार दु:ख न होगा।’ महाप्रभु ने पूछा - ‘मैं यह जानना चाहता हूँ कि भगवान अकेले ही चुपके से चोर की भाँति वृन्‍दावन क्‍यों चले गये, लक्ष्‍मी जी को वे साथ क्‍यों नहीं ले गये?’ स्‍वरूपदामोदर ने कहा- ‘प्रभो ! रासलीला में व्रज की गोपिकाओं का ही अधिकार है, लक्ष्‍मी जी के भाग्‍य में यह सौभाग्‍य सुख नहीं है।’
(क्रमशः)

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