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*दादू मन फकीर ऐसैं, भया, सतगुरु के प्रसाद ।*
*जहाँ का था लागा तहाँ, छूटे वाद विवाद ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४३. स्वामी प्रकाशानन्द जी मन से भक्त बने*
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प्रकाशानन्द जी ने कहा- ‘हाँ, यह तो सत्य है कि श्रीमदभागवत को भगवान व्यास देव ने सभी शास्त्रों का सार लेकर बनाया है। श्री नारद जी के उपदेश से उन्होंने भगवान की लीलाओं का वर्णन करने से परम शान्ति भी प्राप्त की है और आत्माराम मुनियों तक के लिये उन्होंने ग्रन्थ के आदि में भगवत-भक्ति करते रहने का संकेत कर के उसका कारण बताया है-
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आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमें।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणों हरि:॥[१]
([१] श्रीमद्भा. १/७/१०)
अर्थात 'भगवान गुणों में दिव्यता ही ऐसी है कि कैसे भी अज्ञान रहित आत्माराम मुनि क्यों न हों, वे भी भगवान की अहैतु की भक्ति करते ही है। 'इस बात को मैं मानता हूँ, किन्तु भगवान शंकराचार्य जी ने जो एक दम सविशेष ब्रह्म को गौण बताकर और परम साध्य निर्विशेष ब्रह्म को ही माना है यह क्यों? यही मेरी शंका है।'
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प्रभु ने कहा- 'भगवान शंकराचार्य श्रीमद्भागवत को भी यथाविधि जानते थे, भागवत के प्रति उनकी परम श्रद्धा थी। इस बात को भी जानते थे कि श्रीमद्भागवत व्यास देव जी द्वारा प्रकट हुआ और उसके प्रतिपाद्य सविशेष सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ही हैं। फिर भी उन्होंने निर्विशेष ब्रहा को ही अपने भाष्य में प्रधानता देते हुए उसे ही चरम लक्ष्य माना है ! यह उनकी महानता ही है। महान पुरुषों के सिवा ऐसा साहस कोई दूसरा नहीं कर सकता। उन्होंने लोक कल्याण के ही निमित्त ऐसा किया है।
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प्रकाशानन्द जी ने कहा- 'सूत्रों के अर्थ का अनर्थ करने में कौन-सा लोककल्याण है?' प्रभु ने धीरे से कहा- 'भगवन ! अर्थ कैसा और अनर्थ कैसा? ये तो सब बुद्धि के विकार हैं। असली पदार्थ कहीं शब्दों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है या उसकी सिद्धि तर्क के द्वारा की जा सकती है? असली पदार्थ तो अनुभवगम्य हैं। किसी पद का कुछ अर्थ लगा लें, सभी ठीक हैं। अर्थ लगाने में बुद्धिचातुर्य के सिवा और है ही क्या? अर्थ, लगाना, व्याख्यान करना, भाष्य और पुस्तकों की रचना करना यह सब लौकिकी बुद्धि का काम है, इससे मुक्ति थोड़े ही मिल सकती है? केवल लोगों का मनोरंजन करना है।'
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प्रकाशानन्द जी ने कहा- 'हां, यह बताओ कि भगवन शंकर ने क्या सोचकर जगत को एकदम उड़ा दिया और निर्विशेष ब्रह्म को ही परमसाध्य तत्त्व माना?’.
प्रभु ने धीरे-धीरे मधुर स्वर में कहा- 'भगवन ! शंका या तर्क का होना अज्ञान या पूर्व जन्म कृत पापों का फल है। वे महाभाग पुरुष धन्य हैं जिन्हें ईश्वर के अस्तित्त्व में किसी प्रकार की शंका ही नहीं उठती।
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वे ईश्वर को सर्वशक्मिान और सर्वान्तर्यामी और चराचर विश्व का साक्षी मानकर उन्हीं का चिन्तन करते रहते हैं। उनके लिये पढ़ना, लिखना, बातें करना और ध्यान-उपासना करना आवश्यक नहीं। जो सदा भगवान को सर्वत्र समझ कर और सभी में भगवत-बुद्धि रखकर व्यवहार करेगा, उससे कभी अनर्थ का काम होने का ही नहीं।
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ग्रन्थभार तो अज्ञान का चिह्न हैं। जिन्हें भगवान के सर्वान्तर्यामीप ने का विश्वास नहीं, जिनके मन में भाँति-भाँति की शंकाएँ सदा उठा ही करती हैं, उन्हीं के लिये शास्त्र हैं कि शास्त्रों के द्वारा वे अपनी तार्किक बुद्धि को श्रद्धामय बना लें। यदि अन्त तक बुद्धि तर्क में ही फंसी रही तो शास्त्रों का पढ़ना व्यर्थ है, शास्त्रों के पठन का फल है तर्कातीत होकर श्रद्धालु बन जाना। जो जैसा तार्किक होता है, उसके लिये वैसे ही शास्त्र की आवश्यता होती है।
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दो प्रकार के पुरुष होते हैं- एक ह्दय प्रधान, दूसरे मस्तिष्क प्रधान। ह्दय प्रधान कम होते हैं, मस्तिष्क प्रधान अधिक होते हैं। मस्तिष्क प्रधान वाले बिना तर्क के किसी बात को मानते ही नहीं। जैसे विष की ओषधि विष ही है, अग्नि के जले को तेल लगाकर अग्नि से से ही टीक होता है, उसी प्रकार तर्क वालों की बुद्धि को तर्क द्वारा ही परास्त करना चाहिये।
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तर्क करते-करते बुद्धि को इतने सूक्ष्य विषय में ले जाना चाहिये कि वहाँ से आगे जाने की बुद्धि की शक्ति ही न रहे। तर्क करने से स्थूल बुद्धि सूक्ष्म हो जाती है और सूक्ष्म बुद्धि ही परमार्थ की ओर बढ़ सकती है। भगवान शंकर ने तर्क और युक्तियों द्वारा भगवत्तत्त्व को इसी खूबी के साथ वर्णन किया है कि भारी-से भारी तार्किक भी वहाँ से आगे नहीं बढ़ सकता।
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सचमुच भगवान शंकर ने तर्क का अन्त कर डाला है। वेदान्त श्रवण और पठन का इतना ही प्रयोजन है कि जिनकी बुद्धि तार्किक है वे उसके द्वारा उसे सूक्ष्म और परिष्कृत बनाकर उसे परमार्थगामिनी बनावें। सदा तर्को में ही फंसे रहना लक्ष्य नहीं हैं, क्योंकि परमार्थ का मार्ग तो तर्कातीत है।
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अज्ञान में और श्रद्धा में आकाश-पाताल का अन्तर है। अज्ञानी को भी तर्क नहीं उठता; किन्तु वह परमार्थ की ओर थोड़े ही बढ़ सकता हैं, जब तक उसे सच्ची श्रद्धा न हो। और जिसके हृदय में श्रद्धा है, वह कभी अज्ञानी रह ही नहीं सकता; क्योंकि सच्ची श्रद्धा तो विचार का अन्त होने पर होती है।
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जहाँ तर्क और शंका उठना पूर्व जन्मकृत पापों का फल हैं, वहाँ तर्क उठने पर आलसी और अज्ञानियों की भाँति उसे दबाना भी महापाप है। ऐसा आलसी परमार्थी हो ही नहीं सकता। वह असली श्रद्धालु न होकर श्रद्धालु बनने का ढोंग करता है और ढोंगी से भगवान बहुत दूर रहते हैं।
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जो हृदय प्रधान हैं, भावुक हैं, सरल हैं, उनके मन में शंका उठती ही नहीं। वे तो सदा अपने प्यारे का गुणगान ही सुनना चाहते हैं। उन्हें सविशेष वा निर्विशेष की सिद्धि से कोई प्रयोजन नहीं। भक्ति करते चलो। सविशेष-निर्विशेष जैसा भी होगा वह अपने-आप ही प्रकट हो जायगा। उसके लिये तो श्रीकृष्णचरणाम्बुज ही सत्य हैं। जगत चाहे सत्य हो अथवा असत्य, इससे उसे कोई प्रयोजन नहीं।'[२]
([२] श्रीकृष्णचरणाम्भोजं सत्यमेव विजानताम्।
जगत् सत्यमसत्यं वा नेतरेति मतिर्मम॥)
(क्रमशः)

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