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*पाताल मांही जे आराधै, वासुकि रे गुण गाई ।*
*सहस्र मुख जिह्वा द्वै ताके, सो भी पार न पाई ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २२८)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४३. स्वामी प्रकाशानन्द जी मन से भक्त बने*
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प्रकाशानन्द जी ने कहा- तब तो यह दम्भ हुआ कि समझते कुछ और हैं और सिद्ध कुछ और करते हैं। भगवान शंकर तो इस जगत को त्रिकाल में भी सत्य नहीं मानते, वे तो इसे अनिर्वचनीय ब्रह्म की माया का एक भ्रम पूर्ण पसारा समझते हैं। ऐसा मानने वाले वे सविशेष ब्रह्म की उपासना करने को कैसे कहेंगे?'
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प्रभु ने कहा- 'कहेंगे क्या? उन्होंने स्वयं की है, हृदय की गति की कोई रोक सकता है? जगत नहीं है हम ब्रह्म ही हैं, ये मस्तिष्क के विचार हैं, उनके हृदय तो पूछिये। वे स्वयं कहते हैं-
सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्।
सामुद्रो हि तरंग: क्वचन समुद्रो न तारंग॥
चाहे जीव-ब्रह्म में भेद न हो, तो भी हे नाथ ! मैं तुम्हारा हूँ तुम स्वयं मेरे नहीं हो, 'समुद्र की तरंगें' तो सब कहते हैं, किन्तु तरंगों का समुद्र ऐसा कोई नहीं कहता।' यह उन महापुरुष के वाक्य हैं जो जीवन भर जीव-ब्रह्म की एकता को ही सिद्ध करते रहे थे।'
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आश्चर्य के सहित प्रकाशानन्द जी ने कहा- 'यह तो आचार्य का विनोद है, जैसे यहाँ कल्पित जगत है, वैसे ही व्यवहार में उन्होंने यह बात की दी। असल में जब जगत का अस्तित्व ही नहीं तो कैसी विनय और कैसी प्रार्थना? सदा अपने को ब्रह्म ही समझते रहने का अभ्यास करते रहना चाहिये।'
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प्रभु ने कहा- 'भगवन ! आपका यह कहना ठीक तो है, किन्तु मैं फिर उसी बात को दुहराता हूँ कि यह संसार से क्षुब्ध हुई बुद्धि को बहलाने की बात है। सच्ची शान्ति तो हृदय की आह से होती है। जब सभी तर्को को भूलकर एकान्त में भगवान शंकराचार्य जी की भाँति इस प्रकार दीन होकर प्रार्थना करे, तभी हृदय को सच्ची शान्ति मिल सकती है।
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आचार्य-चरण अपनी प्रसिद्ध षटपदी में प्रभु से प्रार्थना करते हैं-
मत्स्यादिभिरवतारैरवतारवता सदा वसुधाम्।
परमेश्वर परिपाल्यो भवता भवतापभीतोऽहम्॥
संसार को त्रिकाल में भी सत्य न मानने वाले भगवान शंकराचार्य कहते हैं- आप मत्स्यादि अवतार धारण करके सदा पृथ्वी का परिपालन करते रहते हैं। हे प्रभो ! संसार तापों से सन्तप्त हुआ मैं आपकी शरण आया हूँ, आप मेरी रक्षा करें। यह सच्चे हृदय की आावाज है।'
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प्रकाशानन्द जी ने कहा- 'यथार्थ में तो यह जगत असत्य ही है ओर जीव ही ब्रह्म है। किन्तु जो लोग इसे नहीं समझते और असत्य जगत को ही सत्य समझते हैं, उनके लिये जैसे भगवान शंकर ने संसार की व्यावहारिक सत्ता मानी है, उसी प्रकार यह व्यावहारिक प्रार्थना है।
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वैसे तो मुक्ति ही जीव का चरम लक्ष्य है और भ्रम दूर होते ही इस अज्ञान का नाश हो जाता है और अज्ञान के नाश होते ही जीव ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। हो क्या जाता है उसे अपने असली स्वरूप का बोध हो जाता है।'
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प्रभु ने अत्यन्त ही नम्रता के साथ कहा- 'भगवन ! आप ज्ञानी हैं, पण्डित हैं, शास्त्रज्ञ हैं, हम सबके गुरु हैं। आपके सामने मैं कह ही क्या सकता हूँ? किन्तु मैं फिर कहूँगा, यह हृदय की बात नहीं है। विचारों का परिष्कृत स्वरूप है, भगवन ! प्रेम ही ब्रह्म का सच्चा स्वरूप है।
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प्रेम की उपलब्धि ही जीव का चरम लक्ष्य है। वह करने की चीज नहीं। उसका गान वाणी से नहीं, हृदय से होता है, वह कहा नहीं जाता, अनुभव किया जाता है, उसकी सिद्धि नहीं की जाती, वह स्वत: सिद्ध है; उसे साधनों द्वारा कोई प्राप्त नहीं कर सकता, उसकी प्राप्ति तो प्रभु-कृपा से ही होती है। मैं फिर कहता हूँ भगवान शंकर ने केवल मस्तिष्क प्रधान पुरुषों की बुद्धि को अत्यन्त सूक्ष्य करने के ही निमित्त शारीर के भाष्य की रचना की है। उनका हृदय तो प्रभु प्रेम सामने मुक्ति आदि को तुच्छ समझता है।
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वे स्वयं कहते हैं-
काम्योपासनयार्थयन्त्यनुदिनं किंचित् फलं स्वेप्सितं
केचित् स्वर्गमथापवर्गमपरे योगादियज्ञादिभि: अस्माकं युदनन्दनाड्.घ्रियुगलध्यानावधानार्थिनां
कि लोकेन दमेन किं नृपतिना स्वर्गापवर्गैश्च किम्॥
'बहुत लोग प्रतिदिन अनेक कामनाओं के सहित उपासना करके मनोवांछित फल चाहते हैं, कुछ लोग यज्ञ-यागादि के द्वारा स्वर्ग की इच्छा करते हैं। बहुत-से योगादि के द्वारा मुक्ति की प्रार्थना करते हैं, किन्तु हमें तो नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र के पदारविन्दों के ध्यान में ही तत्परता के साथ संलग्न रहने की इच्छा है। हमें उत्तम लोकों से क्या? हमें राजा बन जाने से, स्वर्ग से और यहाँ तक कि मोक्ष से क्या लेना? हमें तो सतत उन्हीं अरुण वर्ण के चरणों का ध्यान बना रहे !'
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इस श्लोक को कहते-कहते प्रभु का गला भर आया। उनके शरीर में सभी सात्त्विक विकारों का उदय हो उठा। उन्होंने अपने भाव को संवरण करना चाहा, किन्तु वे उसमें समर्थ न हो सके। प्रभु की आँखें ऊपर चढ़ गयीं। शरीर से पसीना निकलने लगा। बेहोश होकर वे वहीं एक तकिय के सहारे लुढ़क गये। उनकी ऐसी दशा देखकर प्रकाशानन्द जी आश्चर्य चकित हो गये और अपने वस्त्र से स्वयं उनको हवा करने लगे।
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उपस्थित सभी संन्यासियों पर प्रभु की बातों का और उनकी इस अदभुत दशा का बड़ा ही गहरा प्रभाव पड़ा। बहुत-से तो उसी समय 'हरि-हरि' करके नाचने लगे। प्रकाशानन्द जी के हृदय में भी खलबली मच गयी। उनका मन बार-बार कह रहा था- 'अरे मूर्ख ! तेरे अज्ञान को मिटाने के निमित्त साक्षात श्री हरि संन्यासी का वेष धारण करके तेरे सामने उपस्थित हैं, तू इनके पादपद्मों को पकड़कर अपने पूर्वकृत पापों के लिये क्षमा- याचना क्यों नहीं करता।
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'किन्तु इतनी भारी प्रतिष्ठा का लालच अभी उनके हृदय में से समूल नष्ट नहीं हुआ था। वे हृदय से तो प्रभु के चरणों के दास बन चुके थे। हृदय तो उन्होंने उसी समय श्री कृष्ण चैतन्य-नामधारी हरि के चरणाम्भोजों में समर्पित कर दिया था, किन्तु शरीर को अभी लोकलज्जावश बचाये हुए थे।
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उसी समय प्रभु को होश हुआ। वे कुछ लज्जित-से हुए तकिये से हटकर एक ओर बैठ गये। उसी समय भोजन के लिये बुलावा आ गया, सभी भोजन करने बैठ गये। प्रभु ने बड़े ही संकोच से संन्यासियों के साथ बैठकर भिक्षा पायी। अन्त में वे श्री प्रकाशानन्द जी के चरणों में प्रमाण करके भक्तों के सहित चन्द्रशेखर के घर चले गये।
(क्रमशः)

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