गुरुवार, 21 मई 2020

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*सेवक की रक्षा करै, सेवक की प्रतिपाल ।*
*सेवग की वाहर चढै, दादू दीन दयाल ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भक्त*
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संतवर दादूजी के शिष्य बारह हजारी संतदासजी के शिष्य भीखजन राजस्थान के शेखावटी प्रदेश के फतेहपुर गांव में रहा करते थे । जाति के महा - ब्राह्मण थे । उनका नियम था वहाँ के श्री लक्ष्मीनाथजी के मंदिर की मूर्ति के दर्शन करके भोजन करते थे । एक दिन वहीं के कुछ भ्रांत लोगों ने यह कहकर कि तुम महा ब्राह्मण हो मंदिर में नहीं जा सकते दर्शन करने नहीं जाने दिया । 
भीखजन मंदिर के पीछे गये और यह प्रण करके कि - "जब तक भगवान श्री लक्ष्मीनाथजी यहाँ से दर्शन नहीं देंगे तब तक मैं अन्न जल नहीं ग्रहण करूंगा ।" वहाँ ही बैठकर भगवान का ध्यान करने लगे । तीसरे दिन भक्त का प्रण पूरा करने के लिये भगवान मंदिर की पिछली दिवार फाड़कर भीखजन के सामने आ गये । भीखजन भी भगवान के दर्शन करके कृत कृत्य हो गये ।
भगवत अपने भक्त का, प्रण पूरा कर देत ।
किया भीखजन का विदित, अपना फेर निकेत ॥४३३॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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