गुरुवार, 21 मई 2020

*१४६. प्रभु का पुरी में भक्तों से पुनर्मिलन*

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*परम गुरु सो प्राण हमारा, सब सुख देवै सारा ।*
*दादू खेलै अनन्त अपारा, अपारा सारा हमारा ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २४२)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४६. प्रभु का पुरी में भक्तों से पुनर्मिलन*
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राय ने कहा- 'प्रभो ! इसे तो हम ही समझ सकते हैं, यथार्थ वर्णन तो इसी श्‍लोंक में किया गया है। ऐसे स्‍वाभाविक गुणपूर्ण श्‍लोक की रचना सभी कवि नहीं कर सकते।' इतना कहर राय ने 'विदग्‍धमाधव'- के अन्‍य भी बहुत-से स्‍थलों को सुना और सुनकर उनके काव्‍य की हृदय से भूरि-भूरि प्रशंसा की।
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'विदग्‍धमाधव' को सुन लेने पर राय रामानन्‍द जी कहने लगे- 'अपने दूसरे नाटक 'ललितमाधव' की माधुरी की बानगी भी इन सभी उपस्थित भक्‍तों को चखा दीजिये। हाँ, उसका भी पहले मंगलाचरण का श्लोक सुनाइये। यह सुनकर श्री रूपजी फिर उसी लहज के साथ श्‍लोक पढ़ने लगे-
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सुररिपुसुदृशमुरोजकोकान्
मुखकमलानि च खेदयन्‍नखण्‍ड:।
चिरमखिलसुहृच्‍चकोनन्‍दी
दिशतु मुकुन्‍दयश:शशी मुदं व:॥[१]
ललितमाधव ना. १/१
धन्‍य है, धन्‍य है और साधु-साधु की ध्‍वनि समाप्‍त होने पर राय महाशय ने कहा- 'श्री भगवान की स्‍तुति के अनन्‍तर इष्‍टस्‍वरूप श्री गुरुदेव की स्‍तुति में जो श्‍लोक हो उसे भी सुनाइये। उसके श्रवण से यहाँ सभी उपस्थित भक्‍तों को अत्‍यन्‍त ही आह्लाद होगा। हाँ सुनाइये। प्रभु की ओर न देखते हुए धीरे-धीरे श्री रूप जी पढ़ने लगे-
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निजप्रणयितां सुधामुदयमाप्‍नुवन् य: क्षितौ
किरत्‍यलमुरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थिति: ।
स लुंचिततमस्‍ततिर्मम शचीसुतासख्‍य: शशी
वशीकृतजगन्‍मना: किमपि शर्म विन्‍यस्‍यतु॥[२]
जो अवनि पर उदित होकर द्विजराज की स्थिति में रहते हुए निजप्रणयरूपी रसामृत को वितीर्ण कर रहे हैं और अज्ञानरूपी अन्‍धकार समूह को दूर करते हैं, वे ही सम्‍पूर्ण जगत के मन को वश में करने वाले 'शचीनन्‍दन' नाम के चन्‍द्रमा हमारा कल्‍याण करें- हमारे लिये मंगल विधान करें। (ललितमाधव ना. १/२)
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इस श्लोक को सुनते ही प्रभु कुछ बनावटी क्रोध के स्‍वर में कहने लगे- 'रूप ने और सम्‍पूर्ण काव्‍य तो बहुत ही सुन्‍दर बनाया। इनका एक-एक श्‍लोक अमूल्‍य रत्‍न के समान है, किन्‍तु जाने क्‍या समझकर इन्‍होंने ये दो-एक अतिशयोक्ति पूर्ण श्‍लोक मणियों में काँच के टुकड़ो के समान मिला दिये हैं?
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इस पर भक्‍तों ने एक स्‍वर से कहा-' हमें तो यही श्‍लोक सर्वश्रेष्‍ठ प्रतीत हुआ है।' बात को यहीं समाप्‍त करने के लिये राय महाशय ने कहा-' अच्‍छा, छोड़िये इस प्रसंग को। आगे काव्‍य की मधुरिमा का पान कीजिये। हाँ, रूप जी ! इस नाटक के भी भाव पूर्ण अच्‍छे-अच्‍छे स्‍थल पढ़कर सुनाइये।'
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इतना सुनते ही श्री रूपजी नाटक के अन्‍यान्‍य स्‍थलों को बड़े स्‍वर के साथ सुनाने लगे। सभी रसमर्मज्ञ भक्त उनके भक्तिभाव पूर्ण काव्‍य की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। अन्‍त में प्रभु रूपजी का प्रेम से आलिंगन करके भक्‍तों को साथ लेकर अपने स्‍थान पर चले गये।
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इस प्रकार भक्‍तों के साथ रथ यात्रा और चातुर्मास के सभी त्‍यौहारों तथा पर्वो को पहले की भाँति धूमधाम से मनाकर, क्‍वार के दशहरे के बाद भक्‍तों को गौड़ के लिये विदा किया। नित्‍यानन्‍द जी से प्रभु ने प्रतिवर्ष पुरी न आने का पुन: आग्रह किया; किन्‍तु उन्‍होंने प्रभु-प्रेम के कारण इसे स्‍वीकार नहीं किया।
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सभी भक्‍त गौड़ देश को लौट गये। श्री रूप कुछ दिनों प्रभु के पास और रहे। अन्‍त में कुछ समय के पश्‍चात प्रभु ने उन्‍हें वृन्‍दावन में ही जाकर निवास करने की आज्ञा दी। प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके वे गौड़ देख होते हुए वृन्‍दावन जाने के लिये उद्यत हुए। यही इनकी प्रभु से अन्तिम भेंट थी। यहाँ से जाकर ये अन्तिम समय तक श्री वृन्‍दावन की पवित्र भूमि में ही श्री कृष्‍ण-कीर्तन करते हुए निवास करते रहे। व्रज की परम पावन भूमि को छोड़कर ये एक रात्रि के लिए भी व्रज से बाहर नहीं गये।
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प्रभु ने जाते समय इनका प्रेम पूर्वक आलिंगन किया और भक्ति विषयक ग्रन्‍थों के प्रणयन की आज्ञा प्रदान की। इन्‍होंने प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके श्री कृष्‍ण के गुणगान में ही अपना सम्‍पूर्ण समय बिताया। गौड़ में इनकी कुछ धन-सम्‍पत्ति थी, उसका परिवार वालों में यथारीति विभाग करने के निमित्त इन्‍हें गौड़ भी जाना था, इसलिये ये प्रभु से विदा होकर गौड़ देश को गये और वहाँ इन्‍हें लगभग एक वर्ष धन-सत्‍पत्ति की व्‍यवस्‍था करने के निमित्त ठहरना पड़ा।
(क्रमशः)

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