🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*साहिब सौं साचा नहीं, यहु मन झूठा होइ ।*
*दादू झूठे बहुत हैं, साचा विरला कोइ ॥*
=========================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*साँच निर्भय का अंग ११८*
.
नर नाणे१ पाङै२ भरे, मोल न पाव हिं मूल३ ।
त्यों रज्जब तुलि४ कांण की, सदा बहावै५ धूल ॥२५॥
सिक्का१ दोष२ से भरा होतो किंचित३ भी मूल्य नहीं पाता, वैसे ही नर मिथ्या दोष से भरा हो तो उसका भी आदर नहीं होता । जैसे कांण वाला तुला४ सदा ही धूलि बहन५ करता है, वैसे ही मिथ्या दोष संयुक्त नर सदा धिक्कार का पात्र होता है ।
.
सांच चलेगा एक को, परि सत्य न बोला जाय ।
रज्जब रचना घाट१ में, झूट रह्या सब छाय ॥२६॥
सत्य के मार्ग पर कोई एक ही चलेगा, परन्तु उससे भी सर्वथा सत्य न बोला जायगा, कारण जिह्वा रूप स्थान१ में सब प्रकार से झूठ ही छाया हुआ है ।
.
मुख झूठा भाखै नहीं, बोलण लागा सांच ।
आमदनी१ अविगत्त२ की, रज्जब पलटी वाच ॥२७॥
मुख से मिथ्या नहीं बोलता, सत्य बोलने लगता है तब ईश्वर२ की रची हुई मिथ्या बोलना रूप आय१ को यह प्राणी सत्य वचन द्वारा बदल देता है, मिथ्या के स्थान में सत्य ही बोलता है ।
.
सांच हि सुन्यो सुखी व्है साँचा, झूठे दिल दुख होय ।
रज्जब साँचा साँच बखाणे, फेर सार नहिं कोय ॥२८॥
सच्चा मानव सत्य को सुनकर ही प्रसन्न होता है, झूठे मनुष्य के हृदय में सत्य से से दु:ख होता है किन्तु सच्चा तो सत्य ही बोलता है, यही यथार्थ है, इसमें बदलने का अवकाश नहीं है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें