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*हीरा मन पर राखिये, तब दूजा चढै न रंग ।*
*दादू यों मन थिर भया, अविनाशी के संग ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४८. श्री रघुनाथदास जी का गृह त्याग*
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समय आने पर प्रारब्ध सभी सुरोगों को स्वयं ही लाकर उपस्थित कर देता है। एक दिन अरुणोदय के समय रघुनाथ जी के गुरु तथा आचार्य यदुनंदन जी उनके पास आये। उन्हें देखते ही रघुनाथदास जी ने उन्हें भक्ति भाव से प्रणाम किया।
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आचार्य ने स्नेह के साथ इनके कन्धे पर हाथ रखकर कहा- 'भैया रघु ! तुम उस पुजारी को क्यों नही समझाते? वह चार-पांच दिन से हमारे यहाँ पूजा करने आया ही नहीं। यदि वह नहीं कर सकता तो किसी दूसरे ही आदमी को नियुक्त कर दो'
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धीरे-धीरे रघुनाथदास जी ने कहा- 'नहीं, मैं उसे समझा दूंगा।' यह कहकर वे धीरे-धीरे आचार्य के साथ चलने लगे। उनके साथ-ही-साथ वे बड़े फाटक से बाहर आ गये। प्रात:काल समझकर रात्रि जगे हुए पहरेदार सो गये थे। रघुनाथदास जी को बाहर जाते हुए किसी ने नहीं देखा। जब वे बातें करते-करते यदुनन्दनाचार्य जी के घर के समीप पहुँच गये तब उन्होंने धीरे से कहा- 'अच्छा, तो मैं अब जाऊं?'
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कुछ सम्भ्रम के साथ आचार्य ने कहा- 'हाँ, हाँ, तुम जाओ। लो, मुझे पता भी नहीं, तुम बातों-ही-बातों में यहाँ तक चले आये ! तुम अब जाकर जो करने योग्य कार्य हों, उन्हें करो। 'बस, इसे ही वे गुरु-आज्ञा समझकर और अपने आचार्य महाराज की चरणवन्दना करके रास्ते को बचाते हुए एक जंगल की ओर हो लिये।
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जो शरीर पर पहने थे, वही एक वस्त्र था। पास में न पानी पीने को पात्र था और न मार्गव्यय के लिये एक पैसा। बस, चैतन्यचरणों का आश्रय ही उनका पावन पाथेय था। उसे ही कल्पतरु समझकर वे निश्चिन्त भाव से पगडण्डी के रास्ते से चल पड़े। धूप-छांह की कुल भी परवा न करते हुए वे बिना खाये-पीये 'गौर-गौर' कहकर रुदन करते हुए जा रहे थे।
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जो घर के पास के बगीचे में भी पालकी से ही जाते थे, जिन्होंने कभी कोस भर भी मार्ग पैदल तय नहीं किया था, वे ही गोवर्धनदास मजूमदार के इकलौते लाड़िले लड़ैते लड़के कुवँर रघुनाथदास आज पंद्रह कोस- 30 मील शाम तक चले और शाम को एक ग्वाले के घर में पड़ रहे।
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भूख-प्यास का इन्हें ध्यान नहीं था। ग्वाले ने थोड़ा-सा दूध लाकर इन्हें दे दिया, उसे ही पीकर ये सो गये और प्रात:काल बहुत ही सवेरे फिर चल पड़े। वे सोचते थे, यदि पुरी जाने वाले वैष्णवों ने भी हमें देख लिया तो फिर हम पकड़े जायँगे। इसीलिये वे गांवों में न होकर पगडण्डी के रास्ते से जा रहे थे।
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इधर प्रात:काल होते ही रघुनाथदास जी खोज होने लगी। रघुनाथ यहाँ, रघुनाथ वहाँ, यही आवाज चारों ओर सुनायी देने लगी। किन्तु रघुनाथ यहाँ वहाँ कहाँ? वह तो जहाँ का था वहाँ ही पहुँच गया। अब झींखते रहो। माता छटपटाने लगी, स्त्री सिर पीटने लगी, पिता आँखें मलने लगे, ताऊ बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़े।
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उसी समय गोवर्धनदास मजूमदार ने पांच घुड़सवारों को बुलाकर उनके हाथों शिवानन्द सेन के पास एक पत्री पठायी कि 'रघु घर से भागकर तुम्हारे साथ पुरी जा रहा है। उसे फौरन इन लोगों के साथ लौटा दो।' घुड़सवार पत्री लेकर पुरी जाने वाले वैष्णवों के पास रास्ते में पहुँचे।
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पत्र पढ़कर सेन महाशय ने उत्तर लिख दिया- रघुनाथदास जी हमारे साथ नहीं आये हैं, न हमसे उनका साक्षात्कार ही हुआ। यदि वे हमें पुरी मिलेंगे तो हम आपको सूचित करेंगे।' उत्तर लेकर नौकर लौट आये। पत्र को पढ़कर रघुनाथदास जी के सभी परिवार के प्राणी शोकसागर में निमग्न हो गये।
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इधर रघुनाथदास जी मार्ग की कठिनाईयों की कुछ परवा न करते हुए भूख-प्यास और सर्दी-गर्मी से उदासीन होते हुए पचीस-तीस दिन के मार्ग को केवल बारह दिनों में ही तय करके प्रभुसेवित श्री नीलाचंलपुरी में जा पहुँचे। उस समय महाप्रभु श्री स्वरूपादि भक्तों के सहित बैठे हुए कृष्ण कथा कर रहे थे। .
उसी समय दूर से ही भूमि पर लेटकर रघुनाथदास जी ने प्रभु के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। सभी भक्त सम्भ्रम के सहित उनकी ओर देखने लगे। किसी ने उन्हें पहचाना ही नहीं। रास्ते की थकान और सर्दी-गर्मी के कारण उनका चेहरा एकदम बदल गया था। मुकुन्द ने पहचाकर जल्दी से कहा- प्रभो ! रघुनाथदास जी हैं।'
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प्रभु ने अत्यन्त ही उल्लास के साथ कहा-'हां, रघु आ गया? बड़े आनन्द की बात है।' यह कहरक प्रभु ने उठकर रघुनाथदास जी का आलिंगन किया। प्रभु का प्रेमालिंगन पाते ही रघुनाथदास जी की सभी रास्ते की थकान एकदम मिट गयी। वे प्रेम में विभोर होकर रुदन करने लगे, प्रभु अपने कोमल करों से उनके अश्रु पोंछते हुए धीरे-धीरे उनके सिर पर हाथ फेरने लगे।
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प्रभु के सुखद स्पर्श से सन्तुष्ट होकर रघुनाथदास जी ने उपस्थित सभी भक्तों के चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और सभी ने उनका आलिंगन किया। रघुनाथदास जी के उतरे हुए चेहरे को देखकर प्रभु ने स्वरूप दामोदर जी से कहा-'स्वरूप ! देखते हो न, रघुनाथ कितने कष्ट से यहाँ आया है।
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इसे पैदल चलने का अभ्यास नहीं है। बेचारे को क्या काम पड़ा होगा? इनके पिता और ताऊ को तो तुम जानते ही हो। चक्रवर्ती जी(प्रभु के पूर्वाश्रम के नाना श्री नीलाम्बर चक्रवर्ती)-के साथ उन दोनों का भ्रातृभाव का व्यवहार था, इसी सम्बन्ध से ये दोनों भी हमें अपना देवता करके ही मानते हैं। घोर संसारी हैं।
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वैसे साधु-वैष्णवों की श्रद्धा के साथ सेवा भी करते हैं, किन्तु उनके लिये धन-सम्पत्ति ही सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। वे परमार्थ से बहुत दूर हैं। रघुनाथ के ऊपर भगवान ने परम कृपा की, जो इसे उस अन्धकूप से निकालकर यहाँ ले आये। रघुनाथदास जी ने धीरे-धीरे कहा-'मैं तो इसे श्रीचरणों की ही कृपा समझता हूँ, मेरे लिये तो ये ही युगलचरण सर्वस्व हैं।'
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महाप्रभु ने स्नेह के स्वर में स्वरूप गोस्वामी से कहा-'रघुनाथ को आज से मैं तुम्हें ही सौंपता हूँ। तुम्हीं आज से इनके पिता, माता, भाई, गुरु और सखा सब कुछ हो। आज से मैं इस 'स्वरूप का रघु' कहा करूंगा।' यह कहकर प्रभु ने रघुनाथदास जी का हाथ पकड़कर स्वरूप के हाथ में दे दिया।
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रघुनाथदास जी ने फिर से स्वरूप दामोदर जी के चरणों में प्रणाम किया और स्वरूप गोस्वामी ने भी उन्हें आलिंगन किया। उसी समय गोविन्द ने धीरे से रघुनाथ को बुलाकर कहा- 'रास्ते में न जाने कहाँ पर कब खाने को मिला होगा, थोड़ा प्रसाद पा लो।' रघुनाथ जी ने कहा, 'समुद्र स्नान और श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के अनन्तर प्रसाद पाऊंगा।'
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यह कहकर वे समुद्र स्नान करने चले गये और वहीं से श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करते हुए प्रभु के वासस्थान पर लौटा आये। महाप्रभु के भिक्षा कर लेने पर गोविन्द प्रभु का उच्छिष्ट महाप्रसाद रघुनाथदास जी को दिया। प्रभु का प्रसादी महाप्रसाद पाकर रघुनाथ जी वहीं निवास करने लगे। गोविन्द उन्हें नित्य महाप्रसाद दे देता था और ये उसे भक्ति-भाव से पा लेते थे। इस प्रकार ये घर छोड़कर विरक्त-जीवन बिताने लगे।
(क्रमशः)

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